28 जून, 2012

सुरूर

वही दिन वही रात 
वही सारी कायनात 
कुछ भी नया नहीं 
फिर  भी कुछ सोच 
कुछ दृश्य अदृश्य
दिखाई दे जाते 
कुछ खास कर 
गुजर जाते
फिर शब्दों की हेराफेरी 
जो  भी लिखा जाता 
नया ही नजर आता 
खाली आसव की बोतल में
भर कर उसे परोसा जाता 
बोतल बदलती 
साकी बदलती
पर हाला का प्रभाव
  बदल  नहीं पाता 
उससे उत्पन्न सुरूर में
कुछ कहता 
कुछ छुपा जाता 
जो कहना चाहता 
बेखौफ़ कहता
होगा क्या परिणाम 
वह सोच नहीं पाता |

आशा



17 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय आशा माँ
    नमस्कार !!
    कुछ खास कर
    गुजर जाते
    फिर शब्दों की हेराफेरी
    जो भी लिखा जाता
    ................बहुत उम्दा प्रस्तुति!

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  2. शनिवार 30/06/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. आपके सुझावों का स्वागत है . धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  3. पतझड में जैसे कली खिली, पीकर ऐसा दिखता है,
    गर्मी की लपटे सर्द हवा, इसको पीकर ही लगता है!

    घनघोर घटा में सुर्ख धुंआ,आँसू बन कर आ जाते है,
    जब गम के बादल छाते है,तब मधुशाला हम जाते है

    MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: बहुत बहुत आभार ,,

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  4. हाला के सुरूर में जो कुछ भी कहा जाता है वह भी विश्वसनीय कहाँ होता है ! पीने वाला सच कहता भी है तो लोग भरोसा नहीं करते ! अच्छी रचना !

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  5. बहुत खूब...
    सुन्दर प्रस्तुति...

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  6. कुछ कहता
    कुछ छुपा जाता
    जो कहना चाहता
    बेखौफ़ कहता

    बहुत सुन्दर....

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  7. वाह सच लिखा है ...!!
    सुंदर रचना आशा जी ..!!
    शुभकामनायें ..!

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