23 जुलाई, 2013

बागे वफ़ा



आज न जाने क्यूं ?
बागेवफ़ा वीरान नज़र आता
बेवफ़ा कई दीखते
पर बावफ़ा का पता न होता
चन्द लोग ही ऐसे हैं
जो दौनों में फर्क समझते
जज्बातों की कद्र करते
गलत सही पहचानते
आगे तभी  कदम बढ़ाते
हमराज  बन साथ होते
कुछ ही वादे करते
बड़ी शिद्दत से जिन्हें निभाते
जो बेवफ़ा होते
प्यार को बदनाम करते
झूटमूट के वादे करते
एक भी पूरा न करते
तभी तो विश्वास
प्यार से उठता जाता
हर कदम पर
धोखा ही नज़र आता |
आशा

28 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. आप लोगों की टिप्पणी लिखने को प्रेरित करती हैं |

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  2. तभी तो विश्वास
    प्यार से उठता जाता
    हर कदम पर
    धोखा ही नजर आता बहुत अच्छी पोस्ट ..... आभार

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  3. आपकी रचना कल बुधवार [24-07-2013] को
    ब्लॉग प्रसारण पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |
    सादर
    सरिता भाटिया

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  4. बढ़िया प्रस्तुति

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  5. बहुत अच्छी पोस्ट ..... आभार

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  6. बढ़िया प्रस्तुति !

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  7. प्रशंसनीय रचना - बधाई
    शब्दों की मुस्कुराहट पर .... हादसों के शहर में :)

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  8. सुन्दर प्रस्तुति ....!!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (24-07-2013) को में” “चर्चा मंच-अंकः1316” (गौशाला में लीद) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  9. यथार्थ के धरातल पर वास्तविकता का बाना ओढ़े एक बहुत ही सशक्त एवँ सार्थक रचना ! बहुत सुंदर !

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  10. जीवन के कदुए सच को सहज ही लिखा है ...
    भावमय रचना ...

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