29 अगस्त, 2013

रिश्ते कैसे कैसे


रिश्ते कैसे कैसे
कितने बने कितने बिगड़े
कभी विचार करना
कब कहाँ किससे मिले
उन्हें याद करना
तभी जान पाओगे
है कौन अपना
 कौन पराया
यूं तो बड़ा सरल लगता है
रिश्तों का बखान करना
सतही हों या अन्तरंग
सम्बन्ध हों  खून के
 या बनाए गए
पर होता सच्चा रिश्ता क्या
इस पर गौर करना
आज तक कितने 
तुम्हें अपने लगे
जिन से बिछुड़ कर दुःख हुआ
कितना उनको याद किया
जो कभी नहीं लौटे
क्या कभी किसी का
 अहसान याद कर पाए
किसीने यदि कुछ बुरा किया
 उसे भुला नहीं पाए
कटुता विष बेल सी बढ़ी
फल भी कड़वे ही लगे
मतलब से ही बने रिश्ते
बाकी से किनारा कर गए
फिर प्रश्न क्या
है कौनसा रिश्ता पास का
और कौनसा दूर का
हैं जाने कितने लोग
 दूरदराज़ के
मतलब से चले आते हैं
सड़क पर मिलते ही
कन्नी काट जाते हैं
तब खुद की सोच बदल देती
परिभाषा रिश्ते की
जो कभी बड़ा निकट होता था
अब सतही लगने लगता |
आशा

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार 30/08/2013 को
    हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः9 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra

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  2. सुन्दर प्रस्तुति-
    शुभकामनायें-

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  3. अत्यन्त हर्ष के साथ सूचित कर रही हूँ कि
    आपकी इस बेहतरीन रचना की चर्चा शुक्रवार 30-08-2013 के .....राज कोई खुला या खुली बात की : चर्चा मंच 1353 ....शुक्रवारीय अंक.... पर भी होगी!
    सादर...!

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  4. बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
    अभिव्यक्ति......

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  5. दूरदराज़ के
    मतलब से चले आते हैं
    सड़क पर मिलते ही
    कन्नी काट जाते हैं
    तब खुद की सोच बदल देती
    परिभाषा रिश्ते की
    जो कभी बड़ा निकट होता था
    अब सतही लगने लगता |---
    शायद यही है जिंदगी कडुया सच
    latest postएक बार फिर आ जाओ कृष्ण।

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  6. कोमल भाव स्थित भावपूर्ण रचना...

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  7. रिश्तों का राज़ कहाँ समझ में आता है !

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  8. रिश्तों को क्या खूब परिभाषित किया आपने । कोमल निश्चल सी मासूम रचना मगर प्रभाव छोडती हुई । बहुत अच्छे

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  9. इस जीवन में रिश्तों से बढ़ कर कुछ भी नहीं मानो तो अपने नहीं तो सब मोहमाया है

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  10. सड़क पर मिलते ही
    कन्नी काट जाते हैं
    तब खुद की सोच बदल देती
    परिभाषा रिश्ते की
    जो कभी बड़ा निकट होता था
    अब सतही लगने लगता .....सुंदर...भावपूर्ण रचना...

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  11. जीवन की सच्चाई को सशक्त अभिव्यक्ति दी है आपने रचना में ! इसमें कोई संदेह नहीं जीवन में लोग निकट सम्बन्धियों के अलावा किसी से तभी तक रिश्ता रखना चाहते हैं जब तक उनसे कोई हित सध रहा होता है ! काम खत्म तो रिश्ता भी खत्म ! यथार्थ के निकट एक सशक्त रचना !

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  12. बहुत सुन्दर ,भावभीनी रचना..

    सादर
    अनु

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