08 जनवरी, 2014

महाकवि काली दास



कहता हूँ मैं एक कहानी
उज्जैनी नगरी मैं जानी
पेड़ पर बैठा एक युवक 
हाथ में लिए कुल्हाड़ी
जिस डाल पर बैठा था
उसे ही काट रहा था |
ज्ञानी तरसे उसकी अक्ल पर
धीरे से उसे उतारा
कुछ प्रश्न किये
 वह मूक रहा  |
इसी बात से हो  उत्साहित
पहुंचे राज दरवार में
शास्त्रार्थ का न्योता
राजकुमारी विद्योत्तमा को भिजवाया
जो बैठी थी प्रण किये
 होगा निपुण  शास्त्रों में जो
वही पति होगा उसका |
शास्त्रार्थ होने लगा
काली दास के  मौन इशारे  
ज्ञानी की उन  पर व्याख्या ने
काली दास को विजयी बनाया |
वह राजकुमारी व्याह कर लाया
पाकर  निपट गवार अनपढ़ पति 
विदूषी थी बहुत दुखी
डाटा फटकारा और घर से बेघर किया
वह जंगल जंगल भटका
ज्ञान अर्जित किया  
यही कहानी है उसकी 
जो बाद में प्रसिद्ध महाकवि हुआ
उज्जैनी की शान हुआ 
राजा विक्रम की राजसभा में 
प्रमुख महाकवि कालीदास हुआ |
आशा

21 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आपका-

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन शहीद लांस नायक सुधाकर सिंह, हेमराज और ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी प्रस्तुति गुरुवार को चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है |
    आभार

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  4. कालीदास की रोचक कथा पढ़ कर आनंद हुआ ! बढ़िया प्रस्तुति !

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  5. कालिदास की कहानी, कविता के रूप में पढ़कर अच्छा लगा.

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  6. आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ कड़ियाँ (3 से 9 जनवरी, 2014) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,,सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

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