21 जनवरी, 2014

जब बुलडोजर चला


ताश के पत्तों सा
महल सपनों का ढहा
दिल छलनी हुआ
जब बुलडोजर चला |
एक ही चिंता हुई
जाने कहाँ जाएंगे
कैसे समय निकालेंगे
इस बेमौसम बरसात में |
कोई  मदद न काम आनी है
सारे आश्वासन बेमानी हैं
खुद को ही खोजना होगा
 आशियाना सिर  छिपाने को  |
बस एक ही 
दया प्रभु ने पाली
झोली रही न खाली
कर्मठ हूँ 
साहस रखता हूँ|
हल समस्या का 
 खोज सकता हूँ
इसी लिए दुःख नहीं पालता
अपनी लड़ाई खुद लड़ता हूँ |
आशा

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीयचर्चा मंच पर ।।

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  2. बहुत बेहतरीन...प्रेरक रचना...
    http://mauryareena.blogspot.in/

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  3. बहुत बढ़िया ! जीवन में हर संघर्ष का सामना करने के लिये इसी आत्मविश्वास एवँ हौसले की आवश्यकता होती है ! सुंदर रचना !

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  4. आ० प्रेरित करती शानदार कृति , धन्यवाद
    ॥ जय श्री हरि: ॥

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  5. ..प्रेरक रचना...बहुत बढ़िया !

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  6. आपकी इस प्रस्तुति को आज की सीमान्त गांधी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  7. तेज लिए .. अपनी लढाई खुद लड़ने से ताकत मिलती है ... प्रेरित करती रचना ...

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