20 जनवरी, 2014

कल्पना साकार न हुई



कल्पना छोटे से घर की
जाने कब से थी मन में
सपनों में दिखाई देता वह 
 और आसपास की  हरियाली
जहां बिताती घंटों बैठ
कापी कलम  किताब ले
पन्ने भावों के भरती
कल्पना साकार करती
पर सपना सपना ही रह गया
कभी पूर्ण कहीं हुआ
व्यवधान नित नए आए
विराम उनका  न लगा 
रुक नहीं पाए
ऊपर से महंगाई के साए
दो कक्ष भी पूरे न हुए
घर अधूरा रहा
प्रहार मन पर हुआ
 यदि एक ही लक्ष होता
मन नियंत्रित होता
तभी स्वप्न साकार होता
केवल कल्पना में न जीता |
आशा

16 टिप्‍पणियां:

  1. आ० सुंदर भाव प्रस्तुत करती आपकी बढ़िया कृति , धन्यवाद
    ॥ जय श्री हरि: ॥

    जवाब देंहटाएं
  2. बढ़िया प्रस्तुति--
    आभार आदरणीया-

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (21-01-2014) को "अपनी परेशानी मुझे दे दो" (चर्चा मंच-1499) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं
  4. सुंदर कल्पना ! यथार्थ की तो पूर्ण हो चुकी वर्षों पहले ! अब यह स्वप्न वाली कल्पना भी साकार हो जाये यही शुभकामना है ! हा हा हा !

    जवाब देंहटाएं

Your reply here: