12 जनवरी, 2014

खोजूं कहाँ




खोजूं कहाँ तुझे
ए मेरे मन
न जाने कहाँ
 खो गया है
चैन सारा हर लिया है |
खैर  मना कि मैंने
दर्ज न कराई
कोई शिकायत
तेरे खो  जाने की
नहीं तो क्या हाल होता |
कैद से
 निकल नहीं पाता
रोता चीखता
कितनी भी
 मिन्नतें करता |
आभार मान  सब का 
किसी ने बंधक न बनाया
बहुत मुश्किल से 
तेरा सुराग पाया |
हूँ आश्वस्त 
कभी तो मिलेगा 
मेरी खोज का 
अंत होगा |

आशा

7 टिप्‍पणियां:

  1. यही आश्वस्ति आगे बढ़ाने को प्रेरित करती है ....!!
    सुंदर रचना ।

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  2. मन तो चंचल है ,उसे बांधना मुस्किल है
    खोज खबर लेते रहे ,कहाँ कहाँ जाता है |
    बहुत सुन्दर !
    नई पोस्ट आम आदमी !
    नई पोस्ट लघु कथा

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  3. इस बार आप ही अपने इस चंचल मन को बंधक बना लीजियेगा कि खोजने की नौबत ही ना आये ! बहुत ही सुंदर रचना ! मज़ा आ गया !

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  4. हूँ आश्वस्त
    कभी तो मिलेगा
    मेरी खोज का
    अंत होगा |
    बस यही जज्बात आगे बढ़ाते है....
    बहुत ही सुन्दर रचना....
    :-)

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (13-01-2014) को "लोहिड़ी की शुभकामनाएँ" (चर्चा मंच-1491) पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हर्षोल्लास के पर्व लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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