24 मार्च, 2014

ना कहने को कुछ रहा


ना कहने को कुछ रहा ,
ना सुनने को बाक़ी 
जो देखा है  काफ़ी वही ,

उसका सिला देने को |

गुड़ खाया बोला  गुड़ सा ,आई नहीं मिठास |
कडुवाहट मन से न गयी व्यर्थ रहे प्रयास ||


वाणी मधुरस से पगी ,अंतस तक छा जाय  |
कटु भाषण यदि किया ,धाव गहन हो जाय ||

फूलों  की वादियों  में एक ठूंठ नजर आया 
ना ही कभी फूल  खिले ,नाही कभी हरियाया ||

 प्यार कभी जाना नहीं ,ना ही कभी मुस्कान
चहरे से यूं ही लगता  , कटु भाषण की खान  ||
आशा


 



15 टिप्‍पणियां:

  1. सारपूर्ण रचना ! बहुत सुन्दर ! 'सुनहरी धूप' के किये ढेर सारी बधाइयाँ एवं अभिनन्दन !

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  4. सुन्दर बेहतरीन और सामायिक दोहावली
    एक एक दोहा यथार्थ से परिपूर्ण

    एक नज़र हालात-ए-बयाँ: विरह की आग ऐसी है

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  5. सूचना हेतु धन्यवाद सर |
    आशा

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  6. फूलों की वादियों में ठूंठ..
    अच्छा प्रतीक है..।

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