20 मई, 2014

ये चंद लकीरें


hand
बनी हर हाथ में
ये चंद लकीरें
रहती सदा उत्सुक
बहुत कुछ कहने को
पर सुनने वाला तो हो |
जीवन का पूरा चिट्ठा
लिखा विधाता ने इनमें
पर सही पढने वाला
कोई  तो हो |
जब कोइ हादसा हो
या कोइ समस्या हो
होती क्षमता इनमें
सतर्क करने की
जो हस्त रेखा पढ़ पाए
रेखाएं  मस्तिष्क की समझ पाए
जानकार ऐसा तो हो |
कुछ अध्यन करते
सत्य  बताते
पर  तकदीर की लकीरों पर
विश्वास  तो हो |
आशा

16 टिप्‍पणियां:

  1. नयी पुरानी हलचल का प्रयास है कि इस सुंदर रचना को अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    जिससे रचना का संदेश सभी तक पहुंचे... इसी लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 22/05/2014 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...

    [चर्चाकार का नैतिक करतव्य है कि किसी की रचना लिंक करने से पूर्व वह उस रचना के रचनाकार को इस की सूचना अवश्य दे...]
    सादर...
    चर्चाकार कुलदीप ठाकुर
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  2. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुती,आपका आभार आदरेया।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (21-05-2014) को "रविकर का प्रणाम" (चर्चा मंच 1619) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  4. बहुत बढ़िया ! हाथ की लकीरों को सही समझने वाला और समझाने वाला भी तो हो ! जानना तो सब चाहते हैं लेकिन विश्वास नहीं कर पाते ! सुंदर रचना !

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  5. हाथों की चंद लकीरों का, ये खेल है सब तकदीरों का।

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  6. कौन समझ पाया है लकीरों के उलझे जाल को.

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    1. पर उनके अस्तित्व को भी झुटलाया नहीं जा सकता |

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  7. हाथ की लकीरें भी तो म्हणत से पढ़ी जाती हैं ...

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    1. उसी महनत की लोग कदर नहीं जानते |टिप्पणी हेतु धन्यवाद सर |

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