09 मई, 2014

कितना दुःख होता है

कितना दुःख होता है जब 
मन का मान नहीं होता 
जरा सी बात होती है 
पर अनुमान नहीं होता ।
 हृदय विकल होता है 
विद्रोह का कारण बनता है 
सहनशक्ति साथ छोड़ती 
उग्र रूप दीखता है
विद्रोही मन नहीँ सोचता
जितना भी उत्पात मचेगा 
खुद की ही अवमानना होगी
 जीना अधिक कठिन होगा ।
पर फिर भी लगता आवश्यक
गुबार जो घुमड़ता  मन में
उससे धुंआ ना उठें
वहीं का वहीं दफन हो जाए ।
आशा 



17 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (10-05-2014) को "मेरी हैरानियों का जवाब बस माँ" (चर्चा मंच-1608) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. टिप्पणी हेतु धन्यवाद सर |सूचना के लिए भी धन्यवाद |

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  2. मन जब अपनी पे आ जाता है तो उसे रोकना होता है मुश्किल। सुंदर प्रस्तुति।

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  3. मन तो मन है अपनी पर उतर आये तो किसका वश. सुन्दर प्रस्तुति

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    1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    2. धन्यवाद टिप्पणी हेतु

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  4. मन में उमड़ता गुबार निकल जाने को बेचैन विद्रोही होता मन !
    कभी ठीक भी है !

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  5. कम शब्दों में बहुत कुछ बता दिया ....बहुत खूब

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  6. मन की कशमकश को बड़ी सुंदर अभिव्यक्ति दी है ! सशक्त एवं सार्थक प्रस्तुति !

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