03 अप्रैल, 2019

शायद



                                   है शब्द  बहुत सामान्य सा
पर करतब इसके बहुत बड़े
जब भी उपयोग में लाया जाता
कुछ नया रंग दिखलाता
किन्तु परन्तु की उलझने
सदा  अपने साथ लाता
जब भी शायद का उपयोग होता
वह मन में बिछे उलझनों के जाल में
ऐसा फंसता जैसे
 मीन बिन जल के तड़पती
हरबार असमंजस होता हावी
क्या करे ? कैसे करे?
यह यदि किया होता
दुविधा से सरलता से  निकल पाता
उलझन से छुटकारा पाता
इस शब्द की आराधना
पड़ती बहुत मंहगी
उससे बच  कर जो रहता
दुखों से दूरी  बनाकर चलता
वही सफल हो पाता
किन्तु , परन्तु ,क्या, क्यों ,कैसे
के जाल से मन को मुक्त कर पाता
                                सहज भाव से जीवन  जी पाता 
                                             |आशा

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "मुखरित मौन में" शनिवार 06 अप्रैल 2019 को साझा की गई है......... https://mannkepaankhi.blogspot.com/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. सूचना हेतु आभार यशोदा जी
      आशा सक्सेना

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  2. सच है ! यह शब्द किसी सही निर्णय पर पहुँचने नहीं देता!

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  3. शायद का उपयोग टालमटोल करनेवाले ज्यादा करते हैं।

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    1. बहुत सही कहा आपने
      टिप्पणी बहुत अच्छी लगी |
      आशा

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