26 अगस्त, 2019

सोच की इन्तहा



अब तो  सोच  की
इन्तहा आम  हो गई
हम क्या थे ?क्या चाहते थे ?
क्या हो गए ?
किसने बाध्य किया
राज फाश करने को
अब तो बात फैल गई
चर्चा सरेआम हो गई
गैरत ने मजबूर किया
पलटवार ना करने को
बात ख़ास थी पर
अब आम हो गई
मन कुंठित हुआ
निगाहें झुक गईं
कसम खाई मौन रहने की
किसी बात पर
बहस न करने की
यदि कुछ जानने  की
इच्छा भी हुई
मन पर नियंत्रण रखने की
आदत सी  हो गई
पहचान अपनी खुद हो गई|
                                                                             आशा

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 26 अगस्त 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (28-08-2019) को "गीत बन जाऊँगा" (चर्चा अंक- 3441) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सच है ! मन पर नियंत्रण आवश्यक है ! सार्थक सृजन !

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  4. धन्यवाद साधना टिप्पणी के लिए |

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