18 सितंबर, 2019

उस जैसा कोई नहीं

नहीं देखा कोई उस जैसा
जिसे याद नहीं आती किसी की
ना ही जरूरत है उसे किसी की
पर उसे याद किया सारे जमाने ने
न थी चाहत उसकी ऐसी
कि कोई याद करे उसको
पर वह है ही ऐसी हस्ती
जिसे भुला पाना मुश्किल
स्वप्न भी आधा अधूरा
रह जाता उसे देखे बिना
उसके वजूद को झुटलाना नहीं आसान
कण कण में छबि बसी है उसकी ऐसी
नहीं देखा कोई उस जैसा आज के युग में
है गुणों की खान अद्भुद
उस जैसा कोई नहीं
गरूर से है कोसों दूर
विनम्रता खून में रची बसी है
तभी तो कहलाता
सब की आँखों का तारा
उस जैसा कोई नहीं है |
आशा

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (20-09-2019) को    "हिन्दी को बिसराया है"   (चर्चा अंक- 3464)  (चर्चा अंक- 3457)    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।  --हार्दिक शुभकामनाओं के साथ 
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात
    सूचना हेतु आभार सर |

    जवाब देंहटाएं
  3. कौन है यह सद्गुणों की खान हमें भी तो पता चले ! बड़े ही सुदर अल्फाजों में तारीफ़ की है ! बहुत खूबसूरत रचना !

    जवाब देंहटाएं

Your reply here: