27 सितंबर, 2019

सुर संगम



गीत में स्वरों का संगम
वीणा के तारों की झंकार
तबले की थाप पा
मधुर ध्वनि उत्पन्न होती
कर्ण प्रिय सुर साधना होती|
मन मोहक बंदिश सुन कर
जो प्रसन्नता होती
 ले जाती अतीत की गलियों में !
 घंटों स्वर साधना करते थे
 नई धुनें बनाते थे
कविता को गीत में ढालते थे
 जब तक पूरा काम न होता था
उसी में मन उलझा रहता था
जब पूर्णरूप से कृति
 उभर कर आती थी 
हर बार उसे ही गुनगुनाते थे
वे लम्हे भी कितने सुहाने थे
अपनी बनाई धुनों में खो जाते थे
चाहते थे कोई श्रोता मिले
 दाद दे  उत्साहवर्धन करे
सुर संसार है ही ऐसा
दिन रात व्यस्त रखता है
 कोई बंधन नहीं उम्र का उसके लिए
ज्यों ज्यों वय बढ़ती है
 स्वरलहरी और निखरती है |
                                           
 आशा

12 टिप्‍पणियां:

  1. सुरों के संगम का बेजोड़ परिणाम ! बहुत सुन्दर रचना ! बहुत खूब !

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  2. धन्यवाद साधना टिप्पणी के लिए |

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
    ३० सितंबर २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  4. जी नमस्ते,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (30-09-2019) को " गुजरता वक्त " (चर्चा अंक- 3474) पर भी होगी।

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  5. वाह वाह
    मैं भी इससे रिलेट कर पाया।
    शानदार अभिव्यक्ति।
    पधारें शून्य पार 

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  6. सुप्रभात
    टिप्पणी के लिए धन्यवाद रोहितास जी |

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  7. बेहतरीन सृजन ,सादर नमस्कार

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  8. बहुत सुंदर सरस सुर संगम।

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