02 अक्तूबर, 2019

हजारों यूं ही मर जाते हैं


    रूप तुम्हारा महका महका 
जिस्म बना संदल सा 
क्या समा बंधता है 
जब तुम गुजरती हो उधर से |
हजारों यूँ ही मर जाते हैं
 तुम्हारे मुस्कुराने से
जब भी निगाहों के वार चलाती हो
 परदे की ओट से|
और देती हो जुम्बिश हलकी सी जब
 अपनी काकुल को
उसका कम्पन  और
 लव पर आती सहज  मुस्कान
  निगाहों के वार देने लगे 
सन्देश जो रहा अनकहा   |
कहने की शक्ति मन में 
छिपे शब्दों की हुई खोखली
फिर भी हजारों  मर जाते हैं 
तुम्हारे मुस्कुराने से |
इन अदाओं पर 
लाख पहरा लगा हो 
कठिन परीक्षा से गुजर जाते हैं 
बहुत सरलता से |

 आशा




9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 3.10.2019 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3477 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  2. क्या बात है ! इस रूपसी पर तो हम भी मर मिटे !

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  3. उत्तर
    1. सुप्रभात
      टिप्पणी के लिए धन्यवाद गगन जी |

      हटाएं
  4. धन्यवाद अनीता जी टिप्पणी के लिये |

    जवाब देंहटाएं

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