09 अक्तूबर, 2019

बुद्धि

 बुद्धि के दो रूप होते
कुबुद्धि और सुबुद्धि
जब भी पहली जाग्रत होती
समाज में विघटन होता
कई रावण पैदा होते
राम उन्हें नष्ट करने को
होते सचेत तीर मारते
बुद्धि को परिष्कृत करने की
जुगत सोचते रहते
जब सुबुद्धि आती
सभी कार्य सफल होते
समाज बहुत सचेत हो जाता
आगे बढ़ने का मार्ग खोजता
उन्नत समाज आगे आता |
                                                                          आशा

15 टिप्‍पणियां:

  1. इससे खूबसूरत भी क्या कविता होगी !

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    1. धन्यवाद संजय टिप्पणी के लिए |
      दशहरे की शुभकामनाएं |

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 09 अक्टूबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 10.10.19 को चर्चा मंच पर चर्चा -3484 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  4. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में गुरुवार 10 अक्टूबर 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. बुद्धि के दो रूप होते
    कुबुद्धि और सुबुद्धि
    जब भी पहली जाग्रत होती
    समाज में विघटन होता
    कई रावण पैदा होते.... बहुत सुन्दर सृजन
    सादर

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  6. जब सुबुद्धि आती
    सभी कार्य सफल होते
    समाज बहुत सचेत हो जाता
    आगे बढ़ने का मार्ग खोजता
    उन्नत समाज आगे आता |
    बहुत ही सुन्दर...
    वाह!!!

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  7. सुप्रभात
    टिप्पणी हेतु धन्यवाद ओंकार जी |

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  8. संक्षिप्त किन्तु लाख टके की बात कहती सुन्दर प्रस्तुति !

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