11 मार्च, 2020

दिलदार






है  दिल जिसका बड़ा
सही राह चुन पाता
जो गैरों को भी अपनाता
वही दिलदार कहलाता |
 केवल मस्तिष्क  से जिसने सोचा
 सही गलत का भेद  न जाना
भावुक मन को दुखी किया
वह कैसे  दिलदार हुआ |
दौनों की जरूरत है
 दिल  और दिमाग की
केवल भावनाओं में बहने से 
 कुछ भी हासिल नहीं होता |
दिलदार  होते खुद्दार बहुत
 नहीं चाहते खैरात में कुछ
जिस पर होता है अधिकार उनका
उसी तक रहते  सीमित  |
स्वार्थ परक हो कर  यदि
 जोड़ा अपनत्व   किसी से
उस चाहत का दुरुपयोग किया
वह दिलदार कभी न हुआ |
बिना लागलपेट लालच के
 की  सहायता  किसी की
दिल खोल जताया अपनापन
वही सच्चा दिलदार हुआ|
 बड़ा दिल रखना  नहीं  है  बीमारी
है एक ऎसा जज्बा जो  धीरे से पनपा
 जो सरे आम न हुआ सीमित रहा |
हो तुम बड़े दिलदार रसिया 
दिल फैक नहीं हो 
किये गुलाल से लाल गाल  
खूब होली खेली उससे |
उसने किया साज  सिंगार  
हो तुम ही दिलवर उसके
 लोग ईर्षा करते न थकते उससे 
उस पर एकाधिकार केवल तुम्हारा  |
तुम ही हो यार दिलदार दिलवर
रंग रसिया उसके लिए 
और वह है तुम्हारे लिए 
जोड़ी को किसी की नजर|
t
 आशा


9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 12.03.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3638 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की गरिमा बढ़ाएगी

    धन्यवाद

    दिलबागसिंह विर्क

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभार विर्क जी मेरी रचना शामिल करने की सूचना के लिए ||

      हटाएं
  2. धन्यवाद ज्योति जी टिप्पणी के लिए |

    जवाब देंहटाएं
  3. क्या बात है ! दिलदार कहाँ से ढूँढ लिया ऐसा बाँका ! सुन्दर रचना !

    जवाब देंहटाएं
  4. धन्यवाद साधना टिप्पणी के लिए |

    जवाब देंहटाएं
  5. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
    १६ मार्च २०२० के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं

Your reply here: