14 मार्च, 2020

कहने को अब रहा क्या








कहने को अब रहा क्या है
किसे है फुरसत मेरे पास बैठने की
 इस कठिन दौर से गुजरने में
मुझ पर क्या बीत रही है
किसी ने कोशिश ही नहीं की है जानने की
मुझे अकेलापन क्यूँ खलता है
कभी सोचना गहराई से
 तभी जान सकोगे मुझे पहचान सकोगे
मैं क्या से क्या हो गई हूँ  
मैंने किसी को कष्ट न  दिया
पर हुई अब  पराधीन इतनी कि
 अब बैसाखी भी साथ नहीं देती 
जीवन से मोह अब टूट चला है 
अब चलाचली का डेरा है
खाट से  बड़ा ही  लगाव हुआ  है
बिस्तर ने मुझे अपनाया है
मैं स्वतंत्र प्राणी थी 
अब उधार के पल जी रही हूँ 
ठहरे हुए जल की तरह 
 एक ही स्थान पर  ठहर कर रह  गई हूँ
 यह सजा नहीं तो और  क्या है ?
आशा


16 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. सुप्रभात
      टिप्पणी के लिए धन्यवाद शास्त्री जी |

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में रविवार 15 मार्च 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (16-03-2020) को 'दंभ के आगे कुछ नहीं दंभ के पीछे कुछ नहीं' (चर्चा अंक 3642) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    रवीन्द्र सिंह यादव

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    1. सुप्रभात
      पोस्ट को शामिल करने की सूचना के लिए आभार सर |

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  4. जीवन चक्र है दिन रात का फेरा सा... बस अपने हाथ में जो है वही उतना ही हमारा हक़ है
    सच्चाई

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    1. विभा जी सही कहा आपने |टिप्पणी हेतु धन्यवाद |

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  5. दृष्टिकोण बदलते ही सज़ा इनाम में बदल जाती है मैडम नोन तेल लकड़ी में लगी रहतीं तो कैसे आता रचनाओं में दम ! 🙏❤️😂

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  6. उत्तर
    1. सुप्रभात
      मेरी रचना पर टिप्पणी के लिए धन्यवाद अनीता जी |

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