12 जुलाई, 2020

हुस्न की बिजली

 
                                    बैठे रहिये दिल को थाम कर
कोई और नहीं है वह है वही
 जो हुस्न का बहता दरिया था कभी  
 हुस्न की बिजली दिलों पर
 फिर से  गिराने आ गया |
मन में था एक शगल जिसे
वह भूल नहीं   पाया था  
इधर उधर भटकता रहा
 पर राह न मिल पाई  
उसी लीक पर चल दिया
जिस पर पहले चला था |
बादल से बादल टकराए
चमकी  बिजली आसमान में
 लो हुस्न की बिजली दिलों पर
वह फिर से गिराने  आ गया |

आशा

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब।
    हुस्न सदैव सलामत नहीं रहता है।

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    1. सुप्रभात
      आपने बिलकुल सही सोचा है |टिप्पणी के लिए धन्यवाद शास्र्त्री जी |

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  2. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार (06-07-2020) को 'मंज़िल न मिले तो न सही (चर्चा अंक 3761) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    -रवीन्द्र सिंह यादव

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    उत्तर
    1. सुप्रभात
      सूचना हेतु आभार रवीन्द्र जी |

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  3. धन्यवाद टिप्पणी के लिए हिंदी गुरू जी |

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