14 जुलाई, 2020

हरे पत्ते अटखेलियाँ करते सूर्य रश्मियाँ से





जब सूर्य की  रश्मियाँ नृत्य करतीं
हरे भरे वृर्क्षों पर वर्षा ऋतु में
उगे  हरे पत्ते  मखमली लगते
सूर्य किरणों से हुई आशिकी जब 
अद्भुद समा हो जाता  |
कभी इधर कभी उधर
जहां स्पर्श होता उनका
आपस में अटखेलियां  करते
उनकी खिलखिलाहट का
छुअन का  आभास होता |
अजीब सी सरसराहट होती
मंद पवन के झोंके से जब
 मिलते आपस में पत्ते
सूर्य रश्मियों में नहाए होते  
कोई इतना भी करीब हो सकता है
ऐसा एहसास जाग्रत होता |
इस सुनहरी आभा को देखते रहने का 
मनोरम  दृश्य को  मन में सजोने का
उसे दिल में बसाने का
फिर दिल में झांकने का 
 कई  बार प्रलोभन होता
 हर बार मन होता उसी दृश्य को 
 बार बार  जीवंत करने का |
                                                आशा

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (15-07-2020) को     "बदलेगा परिवेश"   (चर्चा अंक-3763)     पर भी होगी। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (15-07-2020) को     "बदलेगा परिवेश"   (चर्चा अंक-3763)     पर भी होगी। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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  3. उत्तर
    1. सुप्रभात
      धन्यवाद ओंकार जी टिप्पणी के लिए |

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  4. बहुत बढ़िया सुन्दर, सार्थक एवं सारगर्भित प्रस्तुति ! बहुत अच्छी रचना ! !

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    उत्तर
    1. सुप्रभात
      धन्यवाद साधना टिप्पणी के लिए |

      हटाएं

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