15 जुलाई, 2020

धरती सब के लिए एक सामान






दोपहर में गर्म धरा पर रखते ही कदम
एहसास हुआ कदमों के जलने का
सोचा लोग भी तो कार्य करते है
 नंगे पैर तपती दोपहर में |
क्या वे बचे रहते हैं सूर्य की तपिश से ?
जब वे सहन कर सकते है उसे
 फिर मैं क्यूँ नहीं ?
क्या फर्क है दौनों  में ?
क्या इस लिए कि वे  इसी धरती से जुड़े हुए हैं
पर  मुझे गलतफहमी है
 कि मेरे पैर  जमीन पर टिक नहीं पाते
शायद मुझे पाला गया है बड़ी नजाकत से |
थी सच में मुझे बड़ी भ्रान्ति कुछ विशेष तो है मुझमें
पर जब सख्त तपती बंजर  धरा पर कदम पड़े
सारी गफलत दूर हो गई
जान गई  मैं भी हूँ उनमें से एक |
बस फर्क है इतना कि
 वे हैं मेंहनतकश व्  जुझारू
बंजर धरती पर खेले बड़े हुए
छोटी मोटी चोट से भयभीत नहीं हुए |
 मैं रही घर में  मौम की गुडिया सी
ठण्ड से बचती बचाती वर्षा में भीग जब जाती
बदलते मौसम का वार तक सहन न कर पाती
अपने को कठिन कार्य में अक्षम पाती |
                                               आशा

12 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. सुप्रभात
      टिप्पणी के लिए धन्यवाद शास्त्री जी |

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर चर्चा - 3764 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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    उत्तर
    1. सुप्रभात
      सूचना हेतु आभार सहित धन्यवाद दिल बाग़ जी |

      हटाएं
  3. सुप्रभात
    टिप्पणी के लिए धन्यवाद ओंकार जी |

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  4. सार्थक सृजन ! बहुत सुन्दर रचना !

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  5. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 20 जुलाई 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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