30 अगस्त, 2020

दुकान उलझानों की

                                        मन के किसी कौने में
लगी है  दुकान उलझनों की
मानों शहर के मैदान में
 सजी है दुकाने पठाकों की |
कब विस्फोट हो जाए
किसी को  मालूम नहीं पड़ता
 सब बच निकलना चाहते हैं
 इस बाजार से  पतली गली  से |
मन होकर रह गया है संचय स्थल
भरा हुआ कई समस्याओं से
अब तो  कील रखने की भी
 जगह नहीं है यहाँ |
हर ओर से ना का पहाड़ा
कोई आशा नहीं रही शेष
फिर कोई कहाँ जाए
दिल का बोझ उतारने को |

                                             

आशा

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 30 अगस्त 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. उत्तर
    1. धन्यवाद हिंदी गुरू जी टिप्पणी के लिए |

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  3. नमस्ते,

    आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 1 सितंबर 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!



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  4. सार्थक रचना ! जीवन नाम ही है सुख दुःख के झूले का ! धुप छाँव की तरह ये दिन गुज़र जाते हैं ! समस्याएँ हैं तो उनके हल भी होते ही हैं ! धैर्य के साथ उनको तलाशने की ज़रुरत होती है !

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