27 सितंबर, 2020

सूनी सूनी महफिल है तुम्हारे बिना

बहार छाई है महफिल में

रात भर महफिल सजी है

तुम्हारी कमी खल रही है

बीते पल बरसों से लग रहे हैं

यह  दूरी  असहनीय लग रही है

पर क्या करूँ मेरे बस में कुछ नहीं है

जो तुमने चाहा वही तो होता आया है

मेरी सलाह तक नहीं चाहिए तुम्हें

फिर मैं ही क्यूँ दीवाना हुआ हूँ ?

तुम्हारे पीछे भाग रहा हूँ

है ऐसा क्या तुममें

आज तक जान नहीं पाया हूँ |

कभी सोच कर देखना

 क्या विशेष है तुम में

मुझे भी तो पता चले

जो तुममें है मुझमें नहीं |

क्या मेरी गजल में जान नहीं

या तुम्हें मेरी लिखाई पसंद नहीं

क्यों चाहती हो मेरा साथ नहीं

या मेरे मन में तुम्हारे लिए  लगाव नहीं |

कभी मन की बात कह देतीं

तुमने  मुझे बताया होता

तब मन को ठेस नहीं लगती

रात भर शमा मेरे दिल सी  जलती रहती 

सूनी सूनी महफिल है तुम्हारे बिना |

 

  

         आशा 

  

12 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा सोमवार 28 सितंबर 2020) को "बेटी दिवस" (चर्चा अंक-3838) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्त्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाए।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    -रवीन्द्र सिंह यादव

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  2. सुन्दर रचनाओं से परिपूर्ण ब्लॉग - - नमन सह।

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  3. वाह ! बहुत सुन्दर रूमानी सी रचना ! बहुत खूब !

    जवाब देंहटाएं

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