03 अक्तूबर, 2020

एक पथिक

 


हे क्लांत पथिक

क्यूँ छाँव देख

 विश्राम नहीं करते

है ऐसा क्या वहां

 क्यूँ  पहुँचाने की

 जल्दी है तुम्हें |

यह तक भूले

हो कितने परेशान

इस विपरीत मौसम में |

यदि बीमार पड़े

 तो कौन साथ देगा

तब कोई सहायता

 नहीं कर पाएगा |

तब पछतावा होगा

काश कहना

मान किया होता

यह दिन तो न

 देखना   पड़ता |

अभी तक खूब आगे

निकल गए  होते

गंतव्य के बहुत

 नजदीक  होते |

आशा     




10 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 03 अक्टूबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (04-10-2020) को     "एहसास के गुँचे"  (चर्चा अंक - 3844)    पर भी होगी। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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