03 नवंबर, 2020

सागर विशाल सी गहराई तुम में


सागर विशाल सी  गहराई तुम में

उसे पार न  कर पाऊँ

कैसे उसमें डूबूं बाहर निकल न पाऊँ

गहराई की थाह न पाऊँ |

की कोशिश कितनी बार

तुम्हें समझने  समझाने की  

पर  असफलता ही हाथ लगी

मन की हार हुई हर बार |

पर कोशिश ना छोड़ पाई

कमर कसी खुद को सक्षम बनाया

 फिर से उसी समस्या  में उलझी

सफलता पाने के लिए |

मुझे हारना अच्छा नहीं लगता

शायद मेरे शब्दकोश में

हार शब्द  है ही नहीं तभी तो

अनवरत लगी रहती हूँ खुद को झुकाने में |

सफलता पाने के लिए क्या करूँ

जब तक सफलता ना पालूँ  

मुझे चैन नहीं मिल पाएगा

जो दूरी तुमने बनाई है मुझे इसे मिटाना है |

तभी तो  निदान हो पाएगा उलझन का

 किसी एक को तो झुकना ही है

 मै झुकी तो तुम्हारा अहम्

बना रहेगा वही तो  तुम चाहते हो |

यदि यही  समस्या का हल है तो यही सही

झुकने से विनम्रता ही आएगी

 मुझ में कोई कमी नहीं होगी

मैं जहां हूँ वहीं रहूँगी |  

आशा

 

     

 

 

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (04-11-2020) को   "चाँद ! तुम सो रहे हो ? "  (चर्चा अंक- 3875)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    सुहागिनों के पर्व करवाचौथ की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    1. सुप्रभात
      मेरी पोस्ट की सूचना के लिए आभार सर|

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  2. यदि यही समस्या का हल है तो यही सही

    झुकने से विनम्रता ही आएगी

    मुझ में कोई कमी नहीं होगी

    मैं जहां हूँ वहीं रहूँगी |
    सुंदर सृजन

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    उत्तर
    1. सुप्रभात
      टिप्पणी के लिए आभार सहित धन्यवाद सधू जी |

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  3. सटीक समाधान समस्या का ! चिंतनपरक सुंदर रचना !

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    उत्तर
    1. सुप्रभात
      टिप्पणी के लिए धन्यवाद साधना |

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