09 फ़रवरी, 2021

चाह मन की


                                                           ना रहा अरमां कोई तब

ना कभी कोई कमी खली

बस एक ही लक्ष रहा

कोई कार्य  अधूरा ना  रह जाए |

दिनभर की  व्यस्तता

कभी समाप्त नहीं होती थी  

 बिश्राम तभी मिलता था

जब आधी रात बीत जाती |

भोर की लाली दस्तक देती

 खिड़की के दरवाजे पर  

पक्षियों का कलरव भी

 आँगन में बढ़ने लगता था |

 अब  समय का अभाव नहीं है

जीवन की गति भी धीमी  है

पर मस्तिष्क बहुत सक्रीय हुआ है

सोच का दायरा  बढ़ा है |

बस यही विचार मन में आते हैं

क्या कुछ छूटा तो नहीं है ?

कोई कार्य अधूरा न रह जाए  

व्यर्थ का  अवसाद मन में न रहे

स्थिर मन मस्तिष्क रहे 

 चिर निंद्रा के आने तक |

आशा

4 टिप्‍पणियां:

  1. धन्यवाद शास्त्री जी टिप्पणी के लिए |

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया ! यही सकारात्मक सोच जीवन को सही दिशा देती है ! बहुत सुन्दर रचना !

    जवाब देंहटाएं
  3. सुप्रभात
    धन्यवाद साधना टिप्पणी के लिए |

    जवाब देंहटाएं

Your reply here: