22 फ़रवरी, 2021

स्वप्नों की चौपाल

स्वप्नों की चौपाल सजी है
कोई व्यवधान न आने दूंगी
बंद आँखों पर चश्मा चढ़ा है
चित्र धूमिल न होने दूंगी |
एक ही अरमां रहा शेष अब
जागते हुए भी उसी में खोई रहूं
मेरा है विश्वास अडिग यह
भावनाओं पर नियंत्रण रखूँ |
केवल कल्पना ही कल्पना हो
और न हो कोई ठोस कार्य
क्या यह गलत नहीं है ?
दिन रात सपनों में खोए रहना
जीवन ऐसे नहीं चलता है |
मनुज को अकर्मण्य बना देता है
इसी लिए ठोस धरातल पर
सजाऊँगी चौपाल स्वप्नों की
वहीं उन्हें साकार करूंगी |
आशा

13 टिप्‍पणियां:

  1. ये स्वप्नों की चौपाल सजी रहे । सुंदर और आत्मविश्वास से भरी रचना ।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (24-02-2021) को     "नयन बहुत मतवाले हैं"  (चर्चा अंक-3987)    पर भी होगी। 
    --   
    मित्रों! कुछ वर्षों से ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके। चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं हो भी नहीं रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत बारह वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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    उत्तर
    1. सुप्रभात
      मेरी रचना की सूचना के लिए आभार सहित धन्यवाद |

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  3. शुभ संकल्प है सपने साकार करने का.तथास्तु!

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  4. वाह वाह ! सार्थक संकल्प ! तथास्तु !

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