23 फ़रवरी, 2021

कान्हां तुम न आए


                                                             कान्हां तुम  न आए मिलने

जमुना किनारे

वट वृक्ष के नीचे

 रोज राह देखी तुम्हारी

 पर तुम न आए |

इतने कठोर कैसे हुए

यह रंग बदला कैसे

तुमने वादा किया था

आने का यहीं पर  |

आए  पर छिपे रहे  करील की

 झाड़ियों के पीछे

है यह कैसा न्याय प्रभू

 तुमने बिसराया मुझे | 

कहाँ तो कहा  कहते थे

जी न पाओगे मुझसे बिछुड़ कर

पर मैंने तुम्हें पहचान लिया है

तुम रह नहीं सकते

बांस की मुरली के  बिना  |

तुमने मुझे भरमाया

अपनी शक्ति मुझे बताया

पर यही गलत फहमी रही

मैंने तुम्हारी बात को सच माना |

राह देखी दिन रात तुम्हारी

पर तुम न आए

तुम तो मथुरा के हो गए

फिर लौट न पाए दोबारा |

मेरा विरही मन

 तुम्हारी राह देखता रहा

नयन धुधले हुए हैं 

वाट जोहते जोहते |

 श्याम तुम कब आओगे

मेरी मनोकामना पूर्ण करोगे

तुम भूले हो अपना वादा

पर मैं नहीं भूली अब तक  |

आशा

 

14 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. सुप्रभात
      धन्यवाद आलोक जी टिप्पणी के लिए |

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 23 फरवरी 2021 को साझा की गई है.........  "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. मेरा विरही मन

    तुम्हारी राह देखता रहा

    नयन धुधले हुए हैं

    वाट जोहते जोहते |---- बहुत सुन्दर

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    1. सुप्रभात
      सुन्दर कमेन्ट के लिए धन्यवाद संदीप जी |

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  4. राधा की शिकायत कृष्ण तक पहुँचा दी इस रचना के माध्यम से । सुंदर प्रस्तुति ।

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    1. सुप्रभात
      धन्यवाद संगीता जी टिप्पणी के लिए |

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  5. बहुत ही सुन्दर व दिव्य भावों से ओतप्रोत मुग्ध करती कविता - - साधुवाद सह।

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  6. सुप्रभात
    धन्यवाद शांतनु जी टिप्पणी के लिए |

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  7. गोपियों की विरह वेदना की सार्थक अभिव्यक्ति ! सुन्दर रचना !

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