21 मार्च, 2021

भरमाया सा


 

है जब तक

प्राणों का आकर्षण

भरमाया सा  

मद मोह माया से  

छला जाता हूँ

मन के  मत्सर से

 अनियंत्रित हूँ  

 बेहाल हुआ 

मेरे   वश में  नहीं   

न अपना  है   

नहीं चंचल चित्त

ना ही वर्जना

तब भी अपनों ने

टोका ही नहीं

अनजान व्यक्ति ने

दी है हिम्मत

बढाया मनोबल

शूरवार हो

फिर कायरता कैसी

साहस बढ़ा

अंतर आत्मा जागी 

कर्मठ हुआ

निर्मल जीवन का

 समझा अर्थ 

हुआ कर्तव्य निष्ठ |

आशा   

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (24-03-2021) को   "रंगभरी एकादशी की हार्दिक शुफकामनाएँ"   (चर्चा अंक 4015)   पर भी होगी। 
    --   
    मित्रों! कुछ वर्षों से ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके। चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं हो भी नहीं रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत बारह वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --  

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    1. सुप्रभात
      मेरी रचना की सूचना के लिए आभार सर |

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 23 मार्च 2021 शाम 5.00 बजे साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति! --ब्रजेंद्रनाथ

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  4. धन्यवाद ब्रजेन्द्र जी टिप्पणी के लिए |

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  5. क्या बात है ! बहुत सुन्दर रचना ! जब अपने पर अटल विश्वास हो तो भरमाना कैसा ! सार्थक सृजन !

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  6. सुप्रभात
    टिप्पणी के लिए धन्यवाद साधना |

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