13 मई, 2021

असहिष्णुता


 

बहती गंगा

है जल नदिया का 

शुद्ध और पवित्र

             आम आदमीं              

संचित रख उसे

  समय पर   

उपयोग करते

आस्था  के नाम  

मंदिर में  रखते

आवे जमजम सा

 चाही  जगह

 उपयोग करते

 शुद्धि के लिए

 पवित्र जल जान  

मैंने सोचा जल को

पूजा  जाता है

 महत्व दिया जाता

रूप आस्था का  

दृष्टिगत होता है    

हर धर्म में

एक पवित्र ग्रन्थ 

शुद्ध जल है   

 जिन  पर  आस्था हो

पूजे जाते हैं

है सवाल आस्था का

ना कि धर्मों का

फिर हर समय 

 झगड़ते  क्यूँ  

धर्म के नाम पर

 पढ़ा लिखा   है  

किस धार्मिक  ग्रन्थ में    

मन मुटाव  

दो धर्मों में होता बैर  

भेद दिलों में  

 है कहाँ  समन्वय

 दो दिलों में

  रहा  कष्ट मन को |

आशा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

3 टिप्‍पणियां:

  1. इतनी समझदारी और सहिष्णुता ही आज के इंसान में आ जाए तो सारे झगड़े ही समाप्त हो जाएँ ! सार्थक सन्देश देती बहुत ही सुन्दर एवं प्रेरक कविता !

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  2. सुप्रभात
    धन्यवाद ओंकार जी टिप्पणी के लिए |

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  3. सुप्रभात
    धन्यवाद साधना टिप्पणी के लिए |

    जवाब देंहटाएं

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