06 नवंबर, 2021

भूली विसरी यादेँ


 

है ऐसा क्या

 उन यादों में

स्वप्नों में भी 

 यादों से बाहर

न निकल पाई |

लाखों जतन किये

सब  हुए व्यर्थ

मैं ना खुद सम्हली

न किसी को

उभरने दिया |

जितनी भी कोशिश की

सब व्यर्थ हो गई  

यादों का दलदल

पार न कर पाई

उसी में डूबती

उतराती रही |

किसी ने जब

हाथ बढाया

बचाने के किये  

झटका हाथ |

 फिर से वहीं

 डूबती रह गईं

 कोशिश का  मन

अब न हुआ  

उसमें ही खो गई |

यही यादें बनी 

जीने का संबल मेरा 

कहाँ समय बीता

अब याद  नहीं |

आशा 

10 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. सुप्रभात
      धन्यवाद ओंकार जी टिप्पणी के लिए |

      हटाएं
  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार
    (7-11-21) को भइयादूज का तिलक" (चर्चा अंक 4240) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
    --
    कामिनी सिन्हा


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    उत्तर
    1. सुप्रभात
      आभार मेरी रचना को शामिल करने के लिए चर्चा मंच में |

      हटाएं
  3. सुप्रभात
    धन्यवाद आलोक जी टिप्पणी के लिए |

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  4. बहुत ही सुंदर व हृदयस्पर्शी रचना!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुप्रभात
      धन्यवाद मनीषा जी टिप्पणी के लिए |

      हटाएं
  5. सुप्रभात
    धन्यवाद साधना टिप्पणी के लिए |

    जवाब देंहटाएं

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