07 दिसंबर, 2021

तुमहो चंचल चपल विद्युत जैसी

 


हो चंचल चपल

विद्युत की तरह

कभी शांत नहीं होतीं

तुमसे सब हारे |

अपने मन को

बहुत समझाया

पर वह न माना

क्या करती ?

बारम्बार तुमसे उलझता

कितनी बार प्रयत्न किये

पर सब व्यर्थ हुए

तुम्हें न बदलना था

न बदलीं किसी कौने से |

अपनी बातों पर

अडिग रहीं

ना कभी सुधरीं

सभी यत्न विफल रहे |

हार कर मैंने ही

मान ली हार 

अपनी बात मनवाने के लिए 

कदम पीछे हटा लिए |

पर मन में अवश्य

एक  विचार  आया

है व्यर्थ तुम जैसी 

अड़ियल से उलझना

 फिर खुद ही दुखी होना |

वही सलाह है सही   

अपनी राह पर चलो

किसी से मत उलझो

दाएं बाएँ मत देखो |

अब मुझे समझ आया

होगा क्या लाभ

आग से हाथ मिलाने से

खुद ही के हाथ जलाने से |

आशा 

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (08-12-2021) को चर्चा मंच          "निमित्त है तू"   (चर्चा अंक 4272)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार करचर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात
    धन्यवाद ओंकार जी टिप्पणी के लिए |

    जवाब देंहटाएं
  3. सुप्रभात
    धन्यवाद साधना टिप्पणी के लिए |

    जवाब देंहटाएं

Your reply here: