15 जनवरी, 2022

आज का परिवेश

 

 वर्तमान परिवेश में 

बहुत कुछ बदल रहा है

ना हम परम्परा वादी रहे

ना ही आधुनिक बन पाए |

हार गए यह सोच कर

 हम क्या से  क्या हो गए

किसी ने प्यार से पुकारा नहीं

हमने भी कुछ स्वीकारा नहीं मन से | 

 किसी बात को मन में चुभने से  

रोका भी नहीं गंभीरता से 

 विचार भी नहीं किया किसी को कैसा लगेगा

हमारे सतही व्यवहार का नजारा |

कोई क्या सोच रहा हमारे बारे में

इसकी हमें भी फिक्र नहीं  

यही है आज आपसी व्यवहार का तरीका

किसी से नहीं सीखा दिखावे का राज |

इस तरह के प्यार का तरीका

जब देखा दूसरों का आना जाना

मन का अनचाहे भी मिलना जुलना

चेहरे पर मुखोटा लगा

 घंटों वाद संवाद करना |

सभी जायज हैं

 आज के समाज में

हर कार्यक्रम में छींटाकसी करने में 

खुद को सबसे उत्तम समझने में |

सब का स्वागत करने के लिए 

मन न होने पर भी दिखावा करना 

दूसरे  के महत्त्व को कम जताना 

यही है आज का चलन | 

आशा 

 

                                                                                                             

 

12 टिप्‍पणियां:

  1. आज की यह दुनिया सतहीपन और बनावट भरी ही रह गयी है ! किसीके आचरण से उसके मन की असली थाह नहीं मिलती ! सब कुछ झूठा और दिखावटी ही लगता है ! सार्थक सृजन !

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  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16-1-22) को पुस्तकों का अवसाद " (चर्चा अंक-4311)पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
    --
    कामिनी सिन्हा

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  3. दूसरे के महत्त्व को कम जताना
    यही है आज का चलन|
    सच्चाई के काफी करीब हैं ये पंक्तियाँ।
    सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए साधुवाद!--ब्रजेंद्रनाथ

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    1. सुप्रभात
      धन्यवाद ब्रजेन्द्र जी टिप्पणी के लिए |

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  4. मन न होने पर भी दिखावा करना

    दूसरे के महत्त्व को कम जताना

    यही है आज का चलन |
    संभवतः सच्चाई यही है । बढ़िया अभिव्यक्ति आदरणीय ।

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    उत्तर
    1. सुप्रभात
      धन्यवाद दीपक जी टिप्पणी के लिए |

      हटाएं
  5. सुप्रभात
    धन्यवाद भारती दास जी टिप्पणी के लिए |

    जवाब देंहटाएं
  6. हकीकत को बयां करती बहुत ही उम्दा रचना
    एक-एक पंक्ति सराहनीय है

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