29 जनवरी, 2022

पिंजरे में बंद जीव



पञ्च तत्व से बनाया पिंजरा

द्वार बंद करना शेष रहा

तभी जीव ने कदम रखा

पीछे से आए माया मोह मद लोभ |

जैसे ही कदम रखे पिंजरे में

द्वार स्वयम  ही बंद हो गया

जीव ने कोशिश की भर पूर पहले

वह टस से मस न हुआ

बंद ही रहा बहुत समय तक |

जीव ने सोचा क्या करे

भरपूर माया का उपयोग किया

माया में हो लिप्त गया

मोह ने अपने भी  पैर पसारे

दौनों का मद ऐसा चढ़ा उस पर

वह मदांध हो गया इतना की

वहीं फंसा रह गया बहुत समय तक |

पर जब हुआ जर जर पिंजरा

याद आई फिर से स्वतंत्र विचरण की

उस द्वार की जिससे

पिंजरे में  प्रवेश किया था |

वह बेचैन हुआ आध्यात्म की ओर झुका

हर बार ईश्वर का ध्यान करता

फिर द्वार खोलने का प्रयत्न करता

माया मोह से मन उचटा उसका |

एक दिन पिजरे का द्वार खुला रह गया

वह भूला उन चारों को जिन ने बांधा था उसको

उड़ चला स्वतंत्र हो अनंत में  

 खाली पिंजरा रह गया जो पञ्च तत्व में विलीन हुआ 

 इस भव सागर में |

आशा


 

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 30 जनवरी 2022 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  2. sसुप्रभात
    आभार रवीन्द्र जी मेरी रचना की सूचनाइस अंक में देने के लिए |

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  3. उत्तर
    1. सुप्रभात
      अमृता जी धन्यवाद टिप्पणी के लिए |

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  4. संसार के मायाजाल की सरलतम व्याख्या। सादर प्रणाम दी।

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    उत्तर
    1. सुप्रभात
      धन्यवाद टिप्पणी के लिए मीना जी |

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  5. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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    1. सुप्रभात
      धन्यवाद भारती जी टिप्पणी के लिए |

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  6. उत्तर
    1. सुप्रभात
      आलोक जी टिप्पणी के लिए धन्यवाद |

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  7. वाह ! जीवन दर्शन की सुन्दर व्याख्या करती मोहक प्रस्तुति ! बहुत बढ़िया !

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  8. सुप्रभात
    धन्यवाद साधना टिप्पणी के लिए |

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