07 अप्रैल, 2022

एक चिड़िया अकेली


 एक चिड़िया अकेली

खोज रही दाना पानी

अपने नन्हें मुन्ने

चूजों के लिए|

वह है इन्तजार में

कब लकडहारा आएगा

फलों से भरी डाली

पर प्रहार करेगा |

नीचे गिरी डाली से

फल चुनने में उसे

बड़ी आसानी होगी

कार्य से हो कर निवृत्त

वह जल्दी से घर पहुंचेगी |

यह भी डर सता रहा उसको

कोई घरोंदा न तोड़ डाले उसका

चूजों को चोट पहुंचाए

वह कैसे यह सदमा सहेगी |

जब लकड़ी कटी

उसने धन्यवाद दिया

लकड़ी काटने वाले को

और चलदी चौंच में दाना भर के |

खुद खाया बच्चों को खिलाया

फिर चल पड़ी नए

बसेरे की तलाश में

शायद यहाँ उसका

इतना ही समय शेष था |

 आशा 


10 टिप्‍पणियां:

  1. नन्ही चिड़िया की यही दिनचर्या, यही चिंताएं, यही आशंकाएं और यही सुख का एहसास अपने बच्चों को दाना खिलाने के बाद ! सुन्दर रचना !

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  2. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-04-2022) को चर्चा मंच       "हे कवि! तुमने कुछ नहीं देखा?"  (चर्चा अंक-4395)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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    उत्तर
    1. सुप्रभात
      धन्यवाद सर मेरी रचना की सूचना के लिए |

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  3. उत्तर
    1. सुप्रभात
      धन्यवाद ओंकार जी टिप्पणी के लिये |

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  4. उत्तर
    1. सुप्रभात
      धन्यवाद दीपक जी टिप्पणी के लिए |

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  5. चिङिया के जीवन की झांकी ।
    प्यारी सी कविता चिङिया की ।

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  6. सुप्रभात
    धन्यवाद नूपुर जी टिप्पणी के लिए |

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