01 मई, 2022

चौबारा


 


चौबारा देखा नहीं आज के  

 गावों के मकानों में

पहले  घर होते थे कच्चे

पर लिपे पुते साफ  सुथरे |

चाहे छत हो कबेलू की पर

चौबारा अवश्य रहता था घर में

सुबह से शाम तक व्यस्तता

बनी रहती थी वहां |

 थी कर्म भूमि घर के सदस्यों की

बीचोंबीच लगा होता था  नीम का पेड़

वहां झूला पड़ा होता था गीत गाए जाते थे

सावन के होली  के सहेलियों के संग |

तुलसी का चौरा वहां होता था

घर की गृहणी स्नान कर दिया लगाती

 जल चढ़ाती तुलसी पर वहां

फिर दैनिक कार्यों में हो जाती थी व्यस्त |

आज के गाँव भी हुए आधुनिक

घर तो अभी भी कच्चे हैं पर चौबारे हुए लुप्त

एक ही घर में कई परिवारों का बसेरा है

चौबारा खो गया है भीड़ में |

आशा 

3 टिप्‍पणियां:

  1. अब क्या शहर क्या गाँव फ्लैट सिस्टम चल पडा है हर जगह ! आँगन चौबारे वाले खुले खुले घर अब विलुप्त से होते जा रहे हैं ! सुन्दर रचना !

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