26 जनवरी, 2010

मुमताज़ की तलाश...

बात बहुत पुरानी है, पर आज भी सोचने पर हसी आ ही जाती है...

कॉलेज का वार्षिकोत्सव होने को था।श्री अवस्थी ने एक एकांकी लिखा और उसके मंचन हेतु उपयुक्त पत्रों की खोज प्रारंभ की।सभी महत्त्वपूर्ण और प्रमुख भूमिका करना चाहते थे।लड़कियों में भी चर्चा ज़ोरों पर थी।अलग अलग व्यक्तित्व वाली लड़कियों में मुमताज़ की भूमिका पाने की होड़ लगी हुई थी। सकारण अपना अपना पक्ष रख कर उस किरदार में अपने को खोजने में लगी हुई थीं।

साँवली सलोनी राधिका थी तो थोड़ी मोती, पर शायद अपने को सबसे अधिक भावप्रवण समझती थी। वह बोली, "ये रोल तो मुझे ही मिलना चाहिए। जैसे ही मैं इन संवादों को बोलूंगी, तो सब पर छा जाऊंगी।" चंद्रा उसके बड़बोलेपन को सहन नहीं कर सकी और उसने पलट वार किया, "जानती हो, मुझसे सुन्दर पूरे कॉलेज में कोई नहीं है। मुमताज़ तो सुन्दरता की मिसाल थी। अतः इस पात्र को निभाने के लिए मैं पूर्ण रूप से अधिकारी हूँ।"

शीबा कैसे चुप रह जाती? बोली, "वाह! मैं ही मुमताज़ का किरदार निभा पाऊंगी। जानती हो, मुझसे अच्छी उर्दू तुम में से किसी को नहीं आती। यदि संवाद सही उच्चारणों के साथ न बोले जाएँ तो क्या मज़ा?"

राधिका तीखी आवाज़ मैं बोली, "ज़रा अपनी सूरत तोह देखो! क्या हिरोइन ऐसी काली कलूटी होती हैं?!"

सुनते ही शीबा उबल पड़ी, "तुम क्या हो, पहले अपने को आईने में निहारो। बिल्कुल मुर्रा भैंस नज़र आती हो।"

"अजी, बिना बात की बहस से क्या लाभ होगा? देख लेना, सर तो मुझे ही यह रोल देंगे। मैं सुन्दर भी हूँ और... प्यारी भी।", मोना ने अपना मत जताया।

"बस बस। रहने भी दो। ड्रामे में हकले तक्लों का कोई काम नहीं होता। हाँ, यदि किसी हकले का कोई रोल होता, to शायद तुम धक् भी जातीं।", मानसी हाँथ नचाते हुई बोली।

इसी तरह आपस में हुज्जत होने लगी और शोर कक्ष के बाहर तक सुनाई देने लगा।बाहर घूम रहे लड़के भी कान लगाकर जानने की कोशिश में लग गये की आखिर मांजरा क्या है?

इस व्यर्थ की बहस की परिणीती देखने को मिली सांस्कृतिक प्रोग्राम में।

पर्दा उठा और हास्य प्रहसन "मुमताज़ की तलाश" की शुरुवात हुई।

एक भारी भरकम प्रोफेस्सर मंच पर अवतरित हुए। वह अपने नाटक की रूप रेखा बताने लगे। फिर आयीं भिन्न भिन्न प्रकार की नायिकाएं और अपना अपना पक्ष रखने लगीं मुमताज़ के पात्र के लिए।

फिर पूरा मंच एक अपूर्व अखाड़े में परिवर्तित हो गया और बेचारे प्रोफेस्सर साहब सिर पकड़कर बैठ गये। उनके मुख से निकला, "हाय!!! कहाँ से खोजूं मुमताज़ को?! यहाँ तो कई कई मुमताज़ हैं!"

और पटाक्षेप हो गया।

24 जनवरी, 2010

मन का सुख

पंख लगा अपनी बाँहों में
मन चाहे उड़ जाऊँ मैं
सहज चुनूँ अपनी मंजिल
झूलों पर पेंग बढ़ाऊँ मैं|
भाँति-भाँति के सपनों में
चुन-चुन कर प्यारे रंग भरूँ
हरा रंग ले सब पर डालूँ
हरियाली सी छा जाऊँ मैं |
प्यारे-प्यारे फूल चुनूँ
गुलदस्ता एक बनाऊँ मैं
अनेकता में एकता का
सच्चा रूप दिखाऊँ मैं |
जब जी चाहे उसको देखें
खुशबू से मन उनका महके
नन्हों की वह ख़ुशी देख कर
ममता से दुलराऊँ मैं|
जात पाँत और रंग भेद
से दूर बहुत वे सरल सहज
और निश्चछल निर्मल
उन पर अपना स्नेह लुटाऊँ
मन का सुख पा जाऊँ मैं |
बच्चों में मैं बच्चा बन कर
सब से नेह बढ़ाऊँ मैं
खुले व्योम के उस कोने में
अपनी मंज़िल पाऊँ मैं |
पंख लगा अपनी बाँहों में
एक परी बन जाऊँ मैं
उनको सदा विहँसता देखूँ
सारे सुख पा जाऊँ मैं |

आशा

23 जनवरी, 2010

कर्त्तव्य बोध

कितने दिन बीत गये अब तो ,
भारत को आज़ाद हुए ,
फिर भी हम न समझ पाये ,
कि क्या कर्तव्य हमारे हैं ,
अधिकार सभी चाहे हमने ,
जिस हद तक जा सके गये ,
रोज-रोज बसों को तोड़ा ,
और चक्का जाम किया,
लाठी खाई, घूँसे खाये ,
पर अपना अधिकार नहीं छोड़ा ,
नेता हमने ऐसे खोजे ,
जो खुद को भी न समझ पाये ,
लोक सभा में जूते चप्पल ,
उनसे से भी न वे बच पाये ,
माइक अक्सर टूटा करते ,
व्यवधान सदा ही होते हैं ,
जब आता प्रश्न अधिकारों का ,
सभी एक जुट होते हैं ,
जब जब यह सब देखा हमने ,
शर्मसार हम होने लगे ,
कैसे नेता चुने गए हैं ,
यह प्रश्न मन में उठने लगे ,
बच्चे इससे क्या पायेंगे ,
केवल अधिकार ही जतालायेंगे ,
जब कर्तव्य सामने होगा ,
उससे वे बचना चाहेंगे ,
अधिकारों कि सूची लम्बी ,
चाहे जैसे उनको पायें ,
कर्तव्य अगर कोई हो उनका ,
उसे सदा ही दूर भगायें ,
आज तक हम विकासशील हैं ,
विकसित देशों से दूर बहुत ,
नव स्वतंत्र देशों से भी पिछड़े ,
हम जहाँ से चले थे वहीं अटके ,
फिर भी कर्तव्य बोध से बचते रहे ,
अपना सोच न बदल पाये ,
हम में से सबने यदि ,
एक कर्तव्य भी चुना होता
हम भी विकसित हो जाते ,
भारत विकसित देश कहाता |

आशा

20 जनवरी, 2010

आत्म दग्धा


माँ के बिना बीता बचपन
केवल रहा पिता का साया 
बाबा को डर लगता था
कैसे बड़ी सुमन होगी
 चिंता वह करता था
 सोच कर हो व्यथित अक्सर दुखी हो जाता था !
कैसे हुआ अजब संजोग
बड़ी बुआ के कहने से
बूढ़े से मेरा ब्याह रचाया
वृद्ध पति रूखा व्यवहार
न कोई ममता  न कोई माया
जलती रोटी देख तवे पर
उसको बहुत गुस्सा आया
जलती लकड़ी से मुझे जलाया !
तब तन तो मेरा झुलसा ही 
मन ने भी हाहाकार मचाया
मरना भी स्वीकार नहीं था
जीवन भी जीना ना चाहा
मरने जीने की उलझन ने
मुझे अधिक बिंदास बनाया !
जब बड़ी हुई थोड़ी मैं
 तन भी भटका मन भी अटका
चाहा साथ किसी ऐसे का
हाथ पकड़ जो साथ ले चले !
फिर से  मैंने धोखा खाया
बिन ब्याही माँ बनी जब 
इसी समाज ने ठुकराया !
कुछ समय जब बीत गया
फूट गया मन का छाला
जैसे तैसे शुरू किया जीवन
एक और से ब्याह रचाया !
ज़िन्दगी फिर पटरी पर आई
मैंने पत्नी धर्म निभाया
एक दिवस वह गया काम पर
 मेरी सौतन ले आया !
मन विद्रूप से भर-भर आया
नफरत ने मन में पैर जमाया
अब खुद ही खुद से लड़ती हूँ
क्या मै ही गलती करती हूँ !
वह सौतन रास नहीं आई
मुझको फूटी आँख नही भाई
बालबाल फिर कर्ज में डूबी
घर चलाना  कठिन हो गया
वह कायर घर से दूर हो गया !
कैसे पालूँ कैसे पोसूँ
इन छोटे-छोटे बच्चों को
कैसे घर का कर्ज उतारूँ
नहीं राह कोई दीखती
बढ़े कर्ज और भूखे बच्चे
सारे धागे लगने लगे कच्चे !
ऐसे में इक ठोला आया
उसने यह अहसास दिलाया
बहुत सहज है , बहुत सरल है
थोड़ा है जो क़र्ज उतर ही जायेगा
ठोले से मैंने प्यार बढ़ाया
फिर से मैंने धोखा खाया
वह तो बड़ा सयाना निकला
भँवर जाल में मुझे फँसाया
उसने मेरा चेक भुनाया !
अब तिल-तिल कर मैं मरती हूँ
खुद ही से नफरत करती हूँ
पर मन के भीतर छुपी सुमन
अक्सर यह प्रश्न उठाती है
मैंने क्या यह गलत किया
और मेरी क्या गलती है ?
जिसने चाहा मुझको लूटा
मेरा जीवन बर्बाद किया !
वे सब तो दूध के धुले रहे
बस मैं ही हर क्षण पिसती हूँ
जब भी  जिधर से निकलती हूँ
मुझ पर उँगली उठती है
हर पल के ताने अनजाने
मुझ में नफरत भरते हैं !

आशा

18 जनवरी, 2010

एक दुलहन

वह सकुचाती और शरमाती ,
धीमे-धीमे कदम बढ़ाती ,
पीले हरेगलीचे पर जब ,
पड़ते महावरी कदम उसके,
लगती वह वीर बहूटी सी ,
वह रूकती कभी ठिठक जाती ,
दूधिया रोशनी जब पड़ती उस पर ,
अपने में ही सिमट जाती ,
तब वह लगती वीर बहूटी सी ,
झुकी-झुकी प्यारी चितवन ,
उसको और विशिष्ट बनाती ,
मुस्कान कभी होंठों पर आती ,
या सकुचा कर वह रह जाती ,
लगती वह वीर बहूटी सी ,
झीना सा अवगुंठन उसका ,
जिसमें से झाँका उसका रूप ,
लाल रंग की साड़ी उसकी ,
दुगना करती रूप अनूप ,
जैसे ही कुछ हलचल होती ,
वह छुईमुई सी हो जाती ,
तब मुझे अविराम कहीं ,
वीर बहूटी याद आती !

आशा

17 जनवरी, 2010

सपने

मैं जो चाहूँ जैसे चाहूँ
सपने में साकार करूँ
बचपन की याद समेटे
खेलूँ कूदूँ हँसती जाऊँ |
कभी बनूँ नन्हीं गुड़िया
माँ को रो रो याद करूँ
सपने भी सच्चे होते हैं
मैं कैसे तुमको समझाऊँ |
रोज नए अवतार धरूँ
सपनों की रानी बन कर
तुमसे रूठूँ या मन जाऊँ
या कभी पेड़ पर चढ़ जाऊँ |
दौड़ धूप और कूदाफाँदी
सहज भाव से कर पाऊँ
सपनों में विचरण करूँ
उनमें ही में खोती जाऊँ|
पानी में उतरूँ या तैरूँ
अगले क्षण पार उतर जाऊँ
जो मंदिर दूर दिखा मुझको
उस तक आज पहुँच पाऊँ |
कभी खोज में व्यस्त रहूँ
या कोई पहेली सुलझाऊँ
किसी विशाल मंच पर चढ़ कर
भाषण दूं स्वयं पर इतराऊँ |
जो कुछ नया मिला मुझको
उस तक पहुँच उसे सहेजूँ
सपने भी सच्चे होते हैं
यह कैसे तुमको समझाऊँ |
मन चाहा रूप धर सपने में
स्वप्नों की वादी में विचरूँ
फूलों से सजूँ हवा में बहूँ
सपने भी सच्चे लगते हैं
यह कैसे तुमको समझाऊँ |
ये चाहत पूरी करते हैं
इच्छा को पंख लगाते हैं
अपनों से कभी मिलाते
गैरों को दूर भगाते हैं
बड़ी असंभव बातों का
आसान हल सुझाते हैं |
है मुश्किल याद रखना उन्हें
वे कभी-कभी तो आते हैं
अपने सारे सपने
मुझको बहुत सुहाते हैं |

आशा

15 जनवरी, 2010

पतंग

मै हूँ एक छोटी पतंग
रंग बिरंगी प्यारी न्यारी
बच्चों के दिल की हूँ रानी
एक दिन की हूँ मेहमान |
सारे साल प्रतीक्षा रहती
ख़त्म हो गयी आज
छुटकी देती मुझको छुट्टी
मेरी डोर कहीं ना अटकी |
आसमान की लम्बी सैर
नहीं किसी से कोई बैर
बच्चों की प्यारी किलकारी
मन में भरती उमंग हजारी |
तरह-तरह के कितने रंग
कई सहेली मेरे संग
मुझ में भरती नई उमंग
मै हूँ एक नन्हीं पतंग |
ठुमक-ठुमक के आगे बढ़ती
फिर झटके से आगे जाती
कभी दाएं कभी बायें आती
जब चाहे नीचे आ जाती|
यदि पेच में फँस जाती
लटके झटके सब अपनाती
नहीं किसी से यूँ डर जाती
सारी तरकीबें अपनाती |
जब तक पेंच पड़ा रहता है
साँसत में दिल बड़ा रहता है
फिर डोर खींच अनजान नियंता
मुझको मुक्ति दे देता है |
मुक्त हो हवा के साथ मैं
विचरण करती आकाश में
मेरा मन हो जाता अंनग
मैं हूँ इक नन्हीं पतंग |

आशा