07 मार्च, 2014

तस्वीर कुछ कह गयी


               (१)
है चन्दा या सूरज यह तो पता नहीं
 पर जल से है यारी इस में शक नहीं |


(२)
रात कितनी भी स्याह क्यूं न हो
 चाँद की उजास कम नहीं होती
प्यार कितना भी कम से कमतर हो
उसकी उन्सियत कम नहीं होती |
(3)
महकता मोगरा
महकता उपवन
बालों में यूं  सजता
झूमता योवन |
(४)
खेतों में आई बहार
पौधों ने किया नव श्रृंगार
रंगों की देखी विविधता
उसने मन मेरा जीता
आशा

06 मार्च, 2014

साधना का उत्तंग शिखर



साधना का उच्च शिखर
 दूर दिखाई देता
वहां पहुँच साधना करना
 सरल नहीं लगता |
पहुँच मार्ग खोजा भी
 पर कंटकों से भरा
दो कदम आगे बढ़ते
लहूलुहान होते
     समझाने की कोशिश करते
इतना सरल नहीं
 उस ऊंचाई को छूना|
पर मन को हार
 स्वीकार नहीं
की संचित शक्ति 
उसी मार्ग पर चलने की |
पक्षियों से साहस लिया
 खुले अम्बर में उड़ने का
फिर भी हारे थके पंथी से
कई बार रुके
काश  मध्य मार्ग मिलता 
 शिखर पर जाने का |
उत्सुकता जागी
 उसे पाने की
अन्य मार्ग कोइ न था
 बहुत देर से जाना । 
प्रयत्न कभी विफल नहीं होते
विफलता मार्ग दिखाती
 आगे बढ़ने की चाहत
और अधिक बढ़ जाती |
वही बनी   मेरी प्रेरणा 
  आधा मार्ग तय भी किया
पर उत्तंग शिखर पर
  परचम ना फैला पाया ।
यही बात मुझे सालती है
फिर भी हिम्मत नहीं हारी है 
मिशन सफल हो 
आशा अभी बाक़ी है |
आशा


05 मार्च, 2014

सब सतही

प्यार न दुलार
 सब सतही
खून ठंडा हो गया
या सफेद
उसमें उबाल
 न आता |
अशांत मन
किसी की सच्चाई
नहीं जानता
इसी लिए
अपने हक़ के लिए
जूझना भी
नहीं चाहता |
सोचा हुआ
पूरा न होता
उदासी का कारण
समझ न आता |
आशा

03 मार्च, 2014

कभी पलट कर देखना



कभी पलट कर देखना
जहां हो वहीं ठहर जाओगे
किसी ने यदि नाम पूंछा
वह भी भूल जाओगे |
प्रेम रोग है ही ऐसा
दीवानगी की हद पार करता
सारी बातें भूल कर
खुद में ही सिमट जाता |
 वह कम नहीं किसी करिश्में से
जो भी इसमें खो जाता
सब कुछ अपना हारता
पर एक उपहार पाता |
आनेवाले जीवन में
यही बड़ा संबल होता
प्यार तो प्यार है
उसका कोई नाम न होता |
है छोटी सी बानगी
उसकी जादूगरी की
उसमें  खोते ही
 खुद को भूल जाओगे
फिर  लौट नहीं पाओगे |
आशा

01 मार्च, 2014

कई रंग



  1. सूर्य विमुख
    पर चंदा रौशन
    उसी ऊर्जा से |



    मेरी दो आँखें
    चाँद व सूरज से
    मेरे दो बेटे |

    की कलकल
    पहाड़ों में नदी ने
    स्वर मधुर |
     
    दृश्य सुन्दर
    हरा भरा पर्वत
    बहती नदी |


    सहेजे रिश्ते
    अंखियों के जल से
    धूमिल हुए |



    हैं रिश्ते ऐसे
    कटु होते या मीठे
    कैसे बताते |
    आशा



28 फ़रवरी, 2014

चिराग जला


रात भर चिराग जला
एक पल भी न सोया
फिर भी तरसा
 एक प्यार भरी निगाह को
जो सुकून दे जाती
उसकी खुशी में शामिल होती |
वह तो संतुष्टि पा जाता
किंचित स्नेह यदि पाता
दुगुने उत्साह से टिमटिमाता
उसी की याद में पूरी सहर
जाने कब कट जाती
कब सुबह होती जान न पाता |
पर ऐसा  कब हुआ
मन चाहा कभी न मिला
सारी शब गुजरने  लगी
शलभों  के साथ में |
आशा