20 मार्च, 2014

खेल खेल में




खेल खेल में मन उलझा
नई पुरानी यादों में
किसी ने दी खुशी
कुछ शूल सी चुभीं |
इसी चुभन ने भटकाया
खेल में व्यवधान आया
मित्रों ने भांप लिया
खेल रोक कर  समझाया |
पहले खेल फिर कुछ और
है बड़ी काम की बात
सफल जीवन में
 जीत का है यही  राज़़ |
अवधान किया केन्द्रित
खेल में व्यस्त हुआ
सोच ने  ली करवट
यादों में मिठास घुली |
है यह कैसा टकराव  
नहीं स्थाईत्व किसी में
जब उभर कर आता  
मन उद्वेलित हो  जाता |
खेल में जीत हार
एक लंबा सिलसिला हुआ
 विचारों का सैलाव आया
कविता का जन्म हुआ |
जब वर्तमान भी जुड़ने लगता
भाव तरंगित होते
शब्द प्रवाहित होते
सोचने को बाध्य करते |
क्या है यही कहानी
खेल खेल में
शब्दों के उछाल की
कविता के जन्म की |
आशा

18 मार्च, 2014

एक बूँद मीठे जल की




एक बूँद मीठे जल की
बादल से आती सागर में
असहज अनुभव करती
खुद को स्थापित करने में |
बारम्बार धकेली जाती
वहीं ठहरे रहने की
उसी में समाए रहने की
नाकाम कोशिश करती |
है कितना कठिन
अपना अस्तित्व बचाए रखना
चोटिल हो कर भी
स्वयं हार न मानना |
विषम स्थितियों में 
 अपना हश्र स्वीकारना
हो जुझारू
अपना सत्व बनाए रखना |
है अद्भुद समानता
नारी में और उसमें
नारी भी है कर्तव्यरत
उसी के समान
अपना अस्तित्व बचाने में
समय के साथ एकाकार होने में |
आशा

16 मार्च, 2014

पर परीक्षा नहीं




चौके से आती सुगंध
ले जाती उस ओर
मावे की गुजिया खीचती
मुझको अपनी और
मन चाहता मुंह में डालूँ
पर माँ की
तिरछी नजर
छूने नहीं देती
मुह में मिठास
धुलने नहीं देती
बस एक वाक्य
सुनाई देता
कल परीक्षा है
क्या भूल गए
खाने को उम्र पडी है
होली फिर भी आनी है
पर परीक्षा नहीं |
आशा

14 मार्च, 2014

फागुनी तरंग (जापानी ताका )



ताका :-
(1)
बाट जोहती
टेसू के रंग बना
रंगती उसे
गुलाल लिए साथ
कि फागुन आया रे |
(2)
भंग तरंग
मिलन की उमंग
मिला फगुआ
मुंह सुर्ख हो रहा
फागुन मन भाया |

(3)

दिल ने कहा
गुनगुनाओ गाओ
बोल जिसके
मनोभाव छू जाते
फागुन में पलाश
खिल मन रिझाते |
 

(4)
फूलों की होली
मथुरा नगरिया
आ चलें वहां
है लठ्ठ मार होली
आज बरसाने में |

(5)

मटकी टूटी
स्वाद है भरपूर
इस चोरी में
खुद खाया खिलाया
मित्र भाव निभाया |
(6)
मुकर गया
माँ ने  पूंछ लिया
माखन खाया
मैंने नहीं उतारी
फिर भी टूट गयी |

(६)

होली की मस्ती
भाँग मिली ठंडाई
साथ मिठाई
गुजिया भी  साथ है
वाह क्या बात है |

(7)

गुलाल लगा
जोरा जोरी राधा से
फाग खेलता
नटखट कन्हिया
बांसुरी का बजैया
आशा

12 मार्च, 2014

फागुन आगया




हाइकू :
-(१)
 खेलती फाग
रंग रसिया साथ
भला लगता |
(२)
भीगी चूनर
पूरी तरबतर
लिपटी जाए |
(३)
रंग गुलाल
मलता मुंह पर
मन बसिया |

(४)

रंग अवीर 
लिए प्यार की साध  
सजनी सजी |
(५)

कन्हा के संग
गोपियाँ खेलें होली
आज होली है |

आशा

10 मार्च, 2014

सैलाव विचारों का


भयावह काली रात में
विचारों का सैलाव है
एक अजनवी साया
चारों ओर से घेरे है |

अनसुनी  आवाज
बहुत दूर से आती है
एक कहानी लुका छिपी करती 
फिर लुप्त हो जाती है |

पर जिन्दगी खामोश है
ना कोइ आस ना उमंग
न जाने क्या सोच है 
मन में बहुत आक्रोश है |
यह शाम यहीं तो
 नहीं थम जाएगी   
काली रात के बाद
कभी तो सुबह आएगी |
दूर सड़क पर 
है कुछ गहमागहमी 
पर रात के अँधेरे में
 यहाँ भी सन्नाटा होगा|
|
क्या यही भयावह स्वप्न
मुझ से दूर हो पाएगा
इस तन्हाई   में
सजीव रंग भर पाएगा |