23 फ़रवरी, 2019

क्यूँ नहीं जाता ?






यादों में बस गया है
 वह दूर नहीं जाता
तन्हाइयों में आकर
 मुझे रोज सताता
यादों से है उसका
 इतना गहरा नाता
भूखे पेट रह कर भी
 कोई शौक नया
 वह  नहीं पालता
जज्बातों से घिरा वह
 है जिनसे उसका गहरा नाता
यही कमजोरी उसे
 देती है  मात सदा
 ना तो जीने देती   है
 ना ही  जुगाड़ कफन का  होता
सब कुछ यादों में
 सिमट कर रह जाता
एक विचार मन  में आता
है क्या वह मेरे लिए
 एक स्वप्न या कल्पना
 है  उसका अस्तित्व क्या ?
मेरे निजि  जीवन में |
                                             
                                              आशा

20 फ़रवरी, 2019

करार खो गया



पलक तक न झपकीं 
 आँखों के आंसू सूखे
बेचैनी बढ़ती जाती थी
  टी.वी  से निगाह न हटती |
बंद द्वार  दिल का 
 खुला जब धीरे से  
सूनी दूर सड़क पर 
कोई  नजर न आया  |
व्योम में  आदित्य की 
 रश्मियाँ आई थीं
पर न जाने क्यूँ थी  
 ऊष्मा उनकी भी फीकी  
 बेचैनी गजब की छाई |
करार  न था दिल को
ज्यों ज्योँ समाचार आगे बढे
 दिल दहलाने वाली ख़बरें
 थमने का नाम न लेतीं  |
मां ने अपना बेटा खोया 
  उसकी गोद उजड़ गई
बहन ने अपना भाई
 अब  राखी किसको बांधेगी|
पत्नि की मांग उजड़ गई 
  विरहन  मन में कसक भरी  |
नन्हों की समझ सेथा  बाहर
  वहाँ  क्या हुआ  था
अपने पापा को याद करते
 कहते वे  कब आएँगे |
उनके दिल का सुकून भी  
 कहीं गुम हो गया था
 उन लम्हों की याद में |
जब तिरंगे में लिपटी
 वीर सपूत की अर्थी वहां आई
 उसकी शहादत रह गई
 तस्वीर में सिमट कर|
उन सभी के दिलों का करार 
  लौट नहीं पाया
हर पल याद सताएगी
वीर की  शहादत की |
व्यर्थ नहीं जाएगी
 देश हित के लिए की गई
उन   यादों की भरपाई 
कभी न हो पाएगी |
 आशा





19 फ़रवरी, 2019

एक करार खुद से







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यूँ तो न जाने कितने करार करते हैं
कोशिश भी  हैं उन्हें  निभाने की
पर अक्सर सफल नहीं हो पाते
बीच में ही कहीं भटक जाते हैं
 भूल जाते हैं  पूरा न करने के लिए
हजार बहाने बनाते हैं
फिर घबरा कर मोर्चा छोड़ जाते हैं
सारे करार धरे रह जाते हैं
पर यदि कोई करार खुद से करते है
 पूरी शिद्दत से  उसे पूरा   करते हैं
तभी सफल हो पाते हैं
सफल व्यक्तित्व के धनी कहलाते  हैं
पर चाहिए दृढ़निष्ठा का होना  
उस किये गए करार पर
आत्मविश्वास खुद पर होना
 स्वनियंत्रण खुद  अपने पर हो
तभी सफलता क़दम चूमती
 वरना असफलता  हाथों में रह जाती
बहुत पास आते हुए  भी
 पास नहीं आती दूर फिसल जाती
 करार जहां था वही रह जाता
ऐसे झूठे बादों का क्या
जो किये  गर्मजोशी से जाते
पर  समय गुजरते ही
ठन्डे बसते में साजो दिए जाते
इतिहास के पन्नों में यूँ ही
                                    सुप्त पड़े रह जाते हैं |
आशा

16 फ़रवरी, 2019

आखिर कब तक

















न जाने कैसे
 नियम बनाए गये   
है कैसी विदेश नीति
आए दिन पीछे से छुरा चलाते है
वार अचूक करते है
जरा भी नहीं सोच जाग्रत होता
जाने कितनी गोद
 सूनी होंगी माताओं की
जाने कितनी महिलाओं को
 दर्द सहना होगा बिछोह का
सूनी उजड़ी मांगों का
 मुल्क कब तक सहेगा
पीठ पीछे वार को
क्या कोई कठिन कदम
 कभी न उठेगा
ऐसा कब तक चलेगा
 रोजाना वीर शहीदों की शहादत
सीमा पर डर का आलम 
मुल्क कबतक सहेगा

आशा