03 अगस्त, 2011

कोइ पूर्ण नहीं होता


जब से सुना उसके बारे में
कई कल्पनाएँ जाग्रत हुईं
जैसे ही देखा उसे
लगी आकर्षक प्रतिमा सी |
था चंद्र सा लावण्य मुख पर
थी सजी सजाई गुडिया सी
आँखें थीं चंचल हिरनी सी
और चाल चंचला बिजली सी |
काले केश घनघोर घटा से
लहराते चहरे पर आते
प्रकाश पुंज सा गोरा रंग
लगी स्वर्ग की अप्सरा सी |
उसकी सुंदरता और निखार
और आकर्षण ब्यक्तित्व का
सम्मोहित करता
लगता प्रतीक सौंदर्य का |
जैसे ही निकली समीप से
उसके स्वर कानों में पड़े
उनकी कटुता से
सारा मोह भंग हो गया |
वह सोचने को बाध्य हुआ
कहीं न कहीं
कुछ तो कमी रह ही जाती है
कोइ पूर्ण नहीं होता |
आशा

21 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक चिंतन .. सौन्दर्य बाह्य न हो कर अंदरूनी हो तो पूर्णता फिर भी संभव है

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  2. अंततः आन्तरिक सौन्दर्य ही मायने रखता है !

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  3. कविता जी सकारात्मकता का संदेश देती आपकी ये कविता पसंद आयी
    धन्यवाद.

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  4. आन्तरिक सौन्दर्य का अपना ही महत्व होता है.. सार्थक चिंतन

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  5. आन्तरिक खूबसूरती को बतलाती रचना...

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  6. दैहिक सौंदर्य मात्र औरों के लिये नयन सुख की भांति होता है ! सच्चा आत्मिक होता है जो अपनों के लिये जीवन को सरस एवं जीने योग्य बनाता है ! वाणी में अपनत्व, मधुरता और कोमलता नहीं तो साथ में रहने वालों का जीना दूभर हो जाता है ! सार्थक चिन्तनयुक्त बेहतरीन रचना !

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  7. वह सोचने को बाध्य हुआ

    कहीं न कहीं

    कुछ तो कमी रह ही जाती है

    कोइ पूर्ण नहीं होता |

    बहुत खूब ...सच बताती आपकी ये रचना

    anu

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  8. हर बार सब कुछ हमारे जैसा नहीं मिलता ....शुभकामनायें !!

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  9. सत्य कहा है आपने...

    रिमझिम सावन कैसा सुन्दर..
    कितना भाये वृहत समंदर...
    बिजली कहीं गिराए सावन...
    सुनामी सागर के अन्दर...

    सादर...

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  10. सार्थक एवं सटीक अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  11. सच सब में कुछ न कुछ कमी होती ही है| चिर सनातन सिद्धहंत का समर्थन करती सुंदर कविता|

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  12. कहीं न कहीं
    कुछ तो कमी रह ही जाती है
    कोइ पूर्ण नहीं होता
    behah sunderta ke saath ek badi sachchyee samne rakh din......bahot achcha laga.

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  13. वाह बेहस सटीक और सार्थक चिन्तन शायद तभी कहा गया है हर चमकने वाली चीज़ सोना नही होती।

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  14. कोई भी इन्सान कभी भी पूर्ण नहीं हो सकता ....कुछ -न -कुछ कमियां तो होंगी ही

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