12 सितंबर, 2011

तुम तो कान्हां निकले


तुमने यह कैसा नेह किया ,कितना सताया तुमने |
ना ही कभी पलट कर देखा ,राह भी देखी उसने |
प्रीत की पेंगें बढ़ाई क्यूं ,तुम तो कान्हां निकले |
याद न आई राधा उनको ,जब गोकुल छोड़ चले |
आशा

16 टिप्‍पणियां:

  1. ओह! विरह की सुन्दर अभिव्यक्ति की है आपने.

    मेरे ब्लॉग पर भी आईयेगा.नई पोस्ट आज जारी की है.

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  2. प्रीत की पेंग बढ़ाई क्यूं ,तुम तो कान्हां निकले |
    याद न आई राधा उनको ,जब गोकुल छोड़ चले |

    संवेदनाओं से भरी बहुत सुन्दर कविता...

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  4. बहुत सुन्दर रचना ! कान्हा पर यह कटाक्ष अच्छा लगा ! बधाई !

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  5. ब्रज की यादें ताज़ा कर दीं आपने

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  6. सुन्दर भावाभिव्यक्ति , आभार



    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें .

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  7. सुन्दर भावो की खूबसूरत अभिव्यक्ति....आभार..

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  8. बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ति .....

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  9. कम शब्दों में सुंदर अभिवक्ती.... समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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  10. विरह की सुन्दर अभिव्यक्ति की है आपने|आभार|

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  11. छोटी मगर संपूर्ण बात कहती...

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