13 जून, 2020

बढ़ती उम्र

सुबह काम शाम काम
ज़रा भी नहीं आराम
  अब होने लगी है थकान
जर्जर  हुआ शरीर |
पीछे छूटे खट्टे मीठे
 अनुभवों के निशान
मस्तिष्क  की स्लेट पर  
पुरानी यादों के रूप में |
समय लौट नहीं पाया
 बहुत साथ दिया उसने  
पहले भी साथ  निभाया  
अब भी निभाता है |
वक्त कब पीछे छूटा याद नहीं रहा
जब तक ताकत थी शरीर में
बढ़ती उम्र के तकाजे से
कब तक बचे रहेंगे |
है यही सत्य जीवन का
कैसे भूल गए 
एक दिन ऐसा भी होगा
 पलग पर पड़े रहेंगे |
 बीते कल की  बातें
 तस्वीरों  की तरह
 एक के बाद एक
आँखों के केनवास पर से गुजरेंगी |
यादें ताजी हो जाएंगी
बापिस बचपन में जाने का
खेल खेलने का मन होगा 
पर केवल कल्पना में|

आशा

 

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 14 जून 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात
    टिप्पणी के लिए धन्यवाद टिप्पणी के लिए |

    जवाब देंहटाएं
  3. कल्पना के संसार से सुन्दर और कोई संसार नहीं ! जहाँ जी चाहे विचरण करा देता है ! जिससे जी चाहे उससे मिलवा देता है ! फुर्सत हो, मन प्रसन्न हो और कल्पना की पतंग आसमान में ऊँचाई पर उड़ रही हो और क्या चाहिए ! सुन्दर सृजन !

    जवाब देंहटाएं

Your reply here: