13 फ़रवरी, 2021

तुम्हारा वंदन

 


 हे हरी तेरा वंदन

 मन को बड़ा सुकून देता

ज़रा समय भी बदलता

बेचैन किये रहता है |

है कितना आवश्यक

सुमिरन तुम्हारा

 समय पर ध्यान तुम्हारा   

आदतों में सुधार होता है |

 फिर पूजा करो या अर्चना

 प्रातः उठते ही  

याद आ जाता है

आज क्या करना है |

एक तो नियमित जिन्दगी होती

सभी कार्य समय पर  होते   

किसी का  कोई तंज

 सहना नहीं पड़ता |

अब जिन्दगी बेजान

 नजर नहीं आती

जिन्दगी में रवानी आती|

 है यही उपलब्धी बड़ी

जो  जाने अनजाने में

आदत में शुमार हो जाती 

 अपना पंचम फहराती |

 बहुत सी समस्याएँ

हल  हो जाती हैं  

कष्ट कम होते जाते हैं

तुम्हारे पास होने से |

वरदहस्त तुम्हारा जब  रह्ता सिर पर

 मै  वही नहीं रह्ती

तुममें इतनी खो जाती हूँ

दुनियादारी से दूर चली  जाती हूँ |

अपनी इच्छाओं अभिलाषाओं को  

जानने  लगती हूँ

है क्या स्वनियंत्रण

पहचानने लगती  हूँ |

आशा 

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (14-02-2021) को "प्रणय दिवस का भूत चढ़ा है, यौवन की अँगड़ाई में"   (चर्चा अंक-3977)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --
    "विश्व प्रणय दिवस" की   
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-    
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    1. सुप्रभात
      मेरी पोस्ट की सूचना के लिए आभार सहित धन्यबाद सर |

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    2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. वाह बहुत सुन्दर रचना ! निश्चित रूप से भक्ति में बड़ी शक्ति होती है !

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  3. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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