वह और मैं
क्यूँ रह पाए साथ
समझे नहीं
एक छत के नीचे
हमारे बीच
नहीं खून का रिश्ता
जाना जरूर
फिर भी लगाव है
दौनों के बीच
यह अवश्य जाना
खोजा गया मैं
तराशी गई वह
अटूट बंध
है क्या बंधन कच्चा
खोज न पाए
गहरा लगाव रहा
यही समझा
उसमें व मुझ में
जो मन भाया
कुछ भी नहीं होती
अवधारणा
रही मन में मेरे
हुई है दृढ
तभी किया एकत्र
एक घर में
है सभी का विचार
एक ही जैसा
तभी रह रहे हैं
चहक रहे
एक छत के नीचे
न दुराव है
न मन मुटाव ही
आपस में है
समझ से
बाहर
है मेरा
तेरा
सब का रहा सांझा
रहता ही है
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (31-03-2021) को "होली अब हो ली हुई" (चर्चा अंक-4022) पर भी होगी।
जवाब देंहटाएं--
मित्रों! कुछ वर्षों से ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। परन्तु प्रसन्नता की बात यह है कि ब्लॉग अब भी लिखे जा रहे हैं और नये ब्लॉगों का सृजन भी हो रहा है।आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके। चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं हो भी नहीं रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत बारह वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
--
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
हटाएंआभार सर मेरी रचना की सूचना के लिए |
हटाएंसुंदर भावाभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंधन्यवाद सर टिप्पणी के लिए |
हटाएंबहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंधन्यवाद सर टिप्पणी के लिए |
हटाएंसुन्दर अभिव्यक्ति ! बहुत बढ़िया !
जवाब देंहटाएंधन्यवाद साधना टिप्पणी के लिए |
जवाब देंहटाएं