30 मार्च, 2021

एक छत के नीचे

 

  


                                                                       वह और मैं   

क्यूँ  रह पाए साथ

 समझे नहीं   

 एक छत के नीचे  

हमारे बीच

 नहीं खून का रिश्ता

   जाना जरूर 

 फिर भी  लगाव है

दौनों के बीच

यह अवश्य जाना

 खोजा गया मैं    

तराशी गई  वह     

अटूट  बंध  

 है क्या  बंधन कच्चा  

खोज न पाए  

गहरा लगाव रहा

यही  समझा 

 उसमें  व मुझ  में     

जो मन भाया

कुछ भी नहीं होती  

अवधारणा  

रही मन में मेरे   

हुई  है  दृढ

तभी  किया एकत्र

एक घर में

 है  सभी का विचार  

 एक ही जैसा  

तभी रह रहे हैं

चहक रहे

एक छत के  नीचे  

 न दुराव है 

न  मन मुटाव ही 

आपस में है    

 समझ से बाहर

  है  मेरा  तेरा  

सब का रहा  सांझा    

 रहता ही  है 

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (31-03-2021) को  "होली अब हो ली हुई"  (चर्चा अंक-4022)   पर भी होगी। 
    --   
    मित्रों! कुछ वर्षों से ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। परन्तु प्रसन्नता की बात यह है कि ब्लॉग अब भी लिखे जा रहे हैं और नये ब्लॉगों का सृजन भी हो रहा है।आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके। चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं हो भी नहीं रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत बारह वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --  

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    1. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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    2. आभार सर मेरी रचना की सूचना के लिए |

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  2. सुन्दर अभिव्यक्ति ! बहुत बढ़िया !

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  3. धन्यवाद साधना टिप्पणी के लिए |

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