30 जुलाई, 2010

है मस्तिष्क बहुत छोटा सा

जाने कितनी घटनाएं होती
गहराई जिनकी
सोचने को बाद्य करती
कोई हल् नजर नहीं आता
पर मन अस्थिर हो जाता
है मस्तिष्क बहुत छोटा सा
कितना बोझ उठाएगा
बहुत यदि सोचा समझा
बोझ तले दब जएगा |
कोई दिन ऐसा नहीं जाता
की सोच को विराम मिले
मस्तिष्क को आराम मिले
जैसे ही पेपर दिखता है
होती है इच्छा पढ़ने की
पर खून खराबा मारधाड़
इससे भरा पूरा अखबार
फूहड़ हास्य या रोना धोना
टी.वी. का भी यही हाल
क्या पढ़ें और क्या देखें
निर्णय बहुत कठिन होता
छोटा सा मस्तिष्क बिचारा
बोझ तले दबता जाता
मंहगाई और भ्रष्ट आचरण
चरम सीमा तक पहुच रहे
आवश्यक सुविधाओ से भी
जाने कितने दूर हुए
नंगे भूखे बच्चे देख
आँखें तो नम होती हैं
कैसे इनकी मदद करें
दुःख बांट नही सकते
कोई हल् निकाल नही सकते
बस सोचते ही रह जाते
बोझ मस्तिष्क पर और बढा लेते
झूठे वादों पर बनी सरकार
उन पर ही टिकी सरकार
नाम जनता का लेकर
लेती उधार विदेशों से
पर सही उपयोग नही होता
कुछ लोग उसे ले जाते हें
गरीब तो पहले ही से
और अधिक पीसते जाते
देख कर हालत उनकी
तरस तो बहुत आता हें
अपने को अक्षम पा
मन और उदास हो जाता है
प्रजातंत्र का यह हाल होगा
पहले कभी सोचा न था
बीता समय यदि लौट आये
तो कितना अच्छा होगा
खुशियाँ पाने के लिए
सभी को प्रयास करना होगा
संकुचित विचार छोड़
आगे को बढ़ना होगा
बोझ मस्तिष्क का
तभी हल्का हो पाएगा
तब वह बेचारा ना होगा |

आशा

29 जुलाई, 2010

मैं क्या चाहती हूं ?

 अपना ब्याह रचाना है ,
यह भली भांति जानती हूं ,
पर मैं कोई गाय नहीं कि ,
किसी भी खूंटे से बांधी जाऊं
ना ही कोई पक्षी हूं ,
जिसे पिंजरे में रखा जाए ,
मैं गूंगी गुड़िया भी नहीं ,
कि चाहे जिसे दे दिया जाए ,
मैं ऐसा सामान नहीं ,
कि बार बार प्रदर्शन हो ,
जिसे घरवालों ने देखा ,
वह मुझे पसंद नहीं आया ,
मैं क्या हूं क्या चाहती हूं ,
यह भी न कोई सोच पाया ,
ना ही कोई ब्यक्तित्व है ,
और ना ही बौद्धिकस्तर ,
ना ही भविष्य सुरक्षित उसका
फिर भी घमंड पुरुष होने का ,
अपना वर्चस्व चाहता है ,
जो उसके कहने में चले,
ऐसी पत्नी चाहता है ,
पर मैं यह सब नहीं चाहती ,
स्वायत्वता है अधिकार मेरा ,
जिसे खोना नहीं चाहती ,
जागृत होते हुए समाज में ,
कुछ योगदान करना चाहती हूं ,
उसमे परिवर्तन चाहती हूं ,
वरमाला मैं तभी डालूंगी ,
यदि उसे अपने योग्य पाऊँगी |

27 जुलाई, 2010

बाढ़

भीषण गर्मी से त्रस्त थे ,
आसार वर्षा के नजर ना आते थे ,
तब पूजा पाठों का दौर चला ,
हवन और अनुष्ठान हुए ,
भविष्य बाणी पंडितों की ,
और सूचनाएं मौसम विभाग की,
सभी लगभग गलत निकलीं ,
पानी की एक बूंद न बरसी ,
जैसे जैसे दिन निकले ,
सूखे के आसार दिखने लगे ,
पर एक दिन अचानक ,
काली घनघोर घटा छाई ,
बादल गरजे ,बिजली चमकी ,
बहुत तेज बारिश आई ,
झड़ी बरसात की ऐसी लगी ,
थमने का नाम न लेती थी ,
मैने जब खिड़की से बाहर झंका ,
कुछ लोगों को टीले पर देखा ,
उत्सुकता जागी मन में ,
छाता थामा ,टीले पहुंचे ,
सब बाढ़ नदी की देख रहे थे .
छोटा पुल पूरा डूब चुका था .
पानी बड़े पुल के भी ऊपर था .
जल स्तर बढ़ता जाता था ,
खतरे का निशान भी,
नजर नहीं आता था ,
नदी पूरे उफान पर थी ,
सारी सीमाएं तोडी पानी ने ,
जब खेतों में प्रवेश किया ,
फिर एक जलजला आया ,
जब निचली बस्ती जल मग्न हुई ,
कोई पेड़ पर बैठा था ,
मचान किसी का आश्रय थी ,
कुछ लोग बच्चों को ले कर ,
सड़क पार करते दिखते थे ,
त्राहि त्राहि मची हुई थी ,
हर ओर भय की चादर पसरी थी ,
जाने कितनी हानि हुई थी ,
कई स्वयंसेवी जुटे हुए थे ,
डूबतों को बचाने में ,
निर्बलों को बाहर लाने में ,
छोटी नौकाओं के सहारे ,
महिलाओं बच्चों को ,निकालने में ,
सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाने में ,
शासन ने शाला खुल्बाई ,
निराश्रितों को राहत पहुंचाई ,
पर वह इतनी ना काफी थी ,
ऊंट के मुंह में जीरे सी थी ,
ऐसी कठिन विपरीत स्थिती,
मैने पहले ना देखी थी ,
प्रकृति से छेड़छाड़ का ,
यह तो एक नतीजा है ,
जिसे रोक ना पाए तो ,
ना जाने क्या क्या होगा |
आशा

26 जुलाई, 2010

आई ऋतू वर्षा की

जब छाई काली घटा
रिमझिम रिमझिम जल बरसा
प्यासी धरती तृप्त हुई
जन मानस भी सरसा
चारों ओर हरियाली छाई
दुर्वा झूमी और मुस्काई
मुरझाए पौधे लहराने लगे
झूलों पर पैंग बढाने लगे
रंग बिरंगी तितलियाँ
पौधों पर मंडराने लगीं
फूलों से प्रेम जताने लगीं
छोटी छोटी जल की बूंदें
धीरे धीरे बढनें लगीं
धरती की गोदी भरने लगीं
मोर और पपीहे के स्वर
वन उपवन में गूँज रहे
हर्ष से भरे हुए वे
वर्षा का स्वागत कर रहे
 सौंधी खुशबू मिट्टी की
मन प्रफुल्लित हो रहा
बहुत आशा से किसान
यह कंचन वर्षा देख रहा
अच्छी फसल की आशा में
अनेकों सपने सजा रहा
नदी तलाब और झरने
वर्षा का जल सहेज रहे
कल कल करती नदियाँ झरने
और आस पास की हरियाली
है  रंगीन समा ऐसा
जी करता है जल में भीगूँ
प्रकृति की गोद में
हल्के ठंडे मौसम में
आँखें अपनी बंद कर लूं
अनुपम दृश्यों को
अपने मन में भर लूँ|

आशा

25 जुलाई, 2010

ओस की एक बूंद


अरुणिमा से भरे नीले आकाश तले
हर श्रृंगार के पत्ते पर
नाचती ,थिरकती
एक चंचल चपला सी
या नन्हीं कलिका के सम्पुट सी
दिखती ओस की एक बूंद |
कभी लगती
एक महनत कश इंसान के
श्रम कण सी ,
कभी मां के माथे पर आए स्वेद सी
या किसी सुकुमारी के
मुंह पर ठहरे जल कण सी
सच्चाई हर कण में उसके
शुद्धता संचित पूंजी उसकी |
आदित्य की प्रथम किरण
जैसे ही पड़ती उस पर
लजा कर झुका लेती आँखें
छुईमुई सी सकुचा कर
जाने कहां छुप जाती है ,
वह नन्ही सी
ओस की एक बूंद
पत्ते पर भी,
अलग थलग सी रहती
पर अस्तित्व अपना
मिटने भी नहीं देती
है छोटी सी उम्र उसकी
पर जिंदगी अनमोल उसकी |
आशा

,

24 जुलाई, 2010

ममता

 कभी सोचा न था
इतनी ममता की हकदार हूं मैं
पार्क में एक अबोध बालक
मेरे बहुत पास आया
पहले मेरी साड़ी पकड़ी
फिर धीरे से उंगली थामी
मुझे ध्यान से देख रहा था
अपनी ओर खींच रहा था
मुझमे भी उत्सुकता जागी
पकड़ा हाथ साथ चल दी
वह डगमग डगमग चलता था
पर जैसे ही भय लगता 
पकड़ उंगली की
और मजबूत करता था
मैं अनजाने मित्र के साथ
खिचती चली गई
गंतव्य तक जब पहुंची
 कुत्ते के बच्चे खेल रहे थे
जैसे ही पिल्लों को देखा
ताली बजाई ,खुशी से उछला
जब पिल्लै ने पूँछ हिलाई
 औरअधिक  पास आया
भयभीत हुआ ,गोद में आया
पिल्लै भी कुछ कम न थे
पैरों पर पंजा मार रहे थे
वे भी खेलना चाहते थे
उसे छूना चाहते थे
जब मम्मी की आवाज सुनी
उतर गोद से मुस्काया
 जाने को बेचैन हुआ
मम्मी की उंगली थामी
और साथ चल दिया
मैं  अकेली खाली बेंच पर बैठी थी
सामने बृक्ष पर बैठी चिड़िया
चूजों को दाना खिला रही थी
इतने में एक कागा आया
आसपास उसके मंडराया
चिड़िया तेजी से उड़ उड़ कर
 करने लगी उसे दूर
पर चिंता एक ही थी
कोई नुक्सान न हो बच्चों को
यह कैसा खेल प्रकृति का
कोई अंत नहीं ममता का |
आशा

22 जुलाई, 2010

तमाशबीन

जन सैलाब उमढ़ता 
जाने किसे देखने को
लोगों को एकत्रित देख
राह चलते रुक जाते लोग 
कुछ और लोग जुड़ जाते है
अक्सर वे यह भी न जानते
भीड़ का कारण क्या है
फिर भी बुत से बने हुए वे
वहीं खड़े रह जाते हैं
फिर सड़क छाप जमावड़े का
पूरा मजा उठाते लोग 
जैसे ही पुलिस देखते हैं
तितर बितर भी हो जाते हैं
यदि कोई दुर्घटना हो
या दुःख का हो कोई अवसर
कुछ ही लोग मदद करते हैं
बाकी तमाशबीन होते हैं
अपने घर चल देते हैं
हर किस्से को बढा चढा कर
जब चटकारे ले कर सुनाते 
वास्तविकता क्या थी
वे यह भी भूल जाते हैं |
आशा