28 मई, 2023

कल्पना के इस दौर में

कल्पना के इस दौर  में

कैसे दूर रहूँ उससे सब ने समझाया भी इतना

कभी कहने में आई यही बात

मन को ना  भाई कैसे |

कविता का कोई रूप नहीं होता

केवल भावनाएं ही होतीं प्रवल 

सुन्दर शब्दों से सजी कविता 

 मन में हिलोरे खा रही है |

प्यार से सजी हुई है

दिलों दीवार में घुमड़ा  रही हैं

कभी नदिया सी बेखौफ  बह रही हैं

अपनी राह से है लगाव इतना

आगे आने वाले राह नहीं भटकते |

यही मन को रहा एहसास

पर मुझे भय नहीं है

अपने ऊपर आत्मविश्वास है इतना

कभी पैर ना फिसले ताकत से रहे भर पूर

यही है अभिलाषा मेरी|

चंचल चपला सी  नदिया 

 प्रकृती में पथ खोज रही है

देती है महत्व उसकी लहराती चाल को 

दीखती है उन्मुक्त बहती नदिया जैसी 

चार चाँद से जोड़े हैं नदियों के उन्मुक्त प्रवाह में| 

आनंद से भर गई मैं प्रकृति के प्रागंन  में 

यही आशा थी मुझको अपनी सोच से

 मुझे एक संबल मिला है आज के इस दौर मैं

जिसे पा कर मैं खुशियों से भर उठी हूँ 

अपने विश्वास पर अडिग खडी  हूँ  मैं |

 मुझे यह गुमान हुआ है कभी किसी ने प्यार ही 

नहीं किया मुझको जब कि मैंने सब कुछ छोड़ा उनपर |

अब लगने लगा है मानों मेरा वजूद ही नहीं 

जी रही हूँ एक बेजान गुडिया सी इस भव सागर में 

कभी खुद का एहसास भीं ना  होगा कल्पना के इस दौर में


आशा सक्सेना

27 मई, 2023

हाईकू


 

१-कितने स्वप्न

देखे हैं दिन ही मैं

समझ आई

२-ये सपने भी

कभी खोते  जाते हैं

 नहीं मिलते

३-जानते नहीं

उलझाते रहे  है 

 बचाओ मुझे

४-प्यार से  बंधे  

 इतने मजबूत

 उसे  जकडे  

५-तेरा  प्यारहै  

इतना नाजुक  कि 

मोम जैसा है

आशा सक्सेना 

25 मई, 2023

जीवन की कहानियां


जीवन की कहानियां

कभी ख़ुशी कभी गम

आए दिन की बात है

 मैं सोच नहीं पाती |

की फरमाइशें बच्चों ने

जिनको पूरा कर न सके

 पत्नी की उदासी में

सारा दिन हुआ बर्बाद |

मन को इतना कष्ट हुआ  

तुम् सह  नहीं पाओगे

सोचोगे कैसे जीवन जिया जाए

वह  तो मुझे ही जीना है|

मै किस तरह जीता हूँ

किसी से कह भी नहीं सकता

सोच रहा हूँ कहीं दूर चला जाऊं

वहीं से नौकरी करूकुछ मदद करू

और कोई विकल्प नहीं मेरे पास |

आशा सक्सेना


22 मई, 2023

जीवन एक वृक्ष जैसा

 

जीवन एक पेड़ जैसा

पहले पत्ते निकलते

फिर डालियाँ हरी  भरी होतीं

वायु के संग खेलतीं

धीरे धीरे कक्ष से

 कलियाँ निकलतीं

पहले तो वे हरी होतीं

फिर समय पा कर

खिलने लगतीं तितली आती

इन से छेड़छाड़ करतीं

भ्रमर भी पीछे ना

वे प्यार में ऐसे खो जाते

पुष्प की गोद में सिमट  रहते

जब तक संतुष्टि ना हो

वहीं  सो  रहते

मन भर जाते ही अपनी राह लेते

इन तीनों का खेल देखने में 

बड़ा मनोरम लगता

हरी डाल पर रंगीन पुष्प अद्भुद द्रश्य होता |

आशा अक्सेना

21 मई, 2023

आज का जीवन

 

इस संसार में अनेक जीव रहते

 अपना जीवन व्यापन करते

एक दूसरे को अपना भोजन बनाते

बड़े का वर्चस्व होता छोटे पर

इसी लीक पर चल रहा

 आज का समाज

ताकतवर से कोई

 जीत नहीं पाता

सदा उसके ही गीत गाता

उसके अनुरूप चलती

मन में सोचता कब तक गुलामी सहेगा

ईश्वर ने किस बात की सजा दी है

उसका अस्तित्व कैसे दबा दबा रहेगा

अब तो ऐसे वातावरण में

जीने का मन नहीं होता  

सोचता रहा कैसे भव सागर पार करू

दूसरा किनारा देख मन मुदित होता

जैसे ही प्रहार  लहर का होता

वह  जल में वह विलीन हो  जाता |

19 मई, 2023

राधा रानी व् कृष्ण








कान्हां ने काली कमली   पहनी 

बाँसुरी ली हाथ बन मैं बजाई 

मधुर धुन जब सुनी ग्वालों ने 

दौड़े चले आए वहां पर |

धेनु चराई शाम तक

घर को चले  थके हारे ग्वाले 

गायों को भी भूख लगी थी 

घर पर दाना पानी का प्रवंध किया

राधाने नाराजगी जताई 

रूठी रहीं बात न की 

कड़ी धुप में तुम मुरझा जातीं 

तुम क्या जानो ठंडी हवा में 

वन में घूमने का आनंद 

कृष्ण ने समझाया

 कल ले चलने का वादा किया

 तब जाके मन पाईं राधा |

आशा सक्सेना   |


18 मई, 2023

प्रथम गुरू को मेरा प्रणाम



मां ने दुलारा बहुत प्यार किया 

पर गलत बात पर बरजा 

मुझे अपनी गलती का एहसास कराया 

हर बात कायदे की सिखाई |

 कभी  न हो अधीर रहो धैर्य से 

यही शिक्षा दी माँ ने 

जिसने किया अलग

मुझको सब से |

ज ब रोना गाना मचाया मैंने 

गोद में ले कर समझाया मुझे 

शांत मन रहने को कहा |

इतनी शिक्षा दी मुझे

 तभी तो प्रथम गुरुं कहलाई 

|है मेरी माँ सब से  अलग 

उस जैसा  कोई नहीं है|

सदा उसकी छाया  में रहूँ

 दिल मेरा यही चाहता 

प्रथम गुरुं को मेरा दिल से प्रणाम 

यही मेरा मन कहता  |

आशा सक्सेना