आज एक बहुत पुरानी कहानी याद आई |दो बिल्ली कहीं से एक रोटी लाईं और खाने के लिए आपस में झगड़ने लगीं |एक बन्दर उनका झगड़ा देख रहा था |
उसने कहा क्यूं झगड़ रही हो ?मेरे पास आओ मैं हिस्सा कर देता हूँ
बिल्ली ने रोटी बन्दर को दी |उसने रोटी के दो भाग किये |जिसमें रोटी ज्यादा थी उसमें से रोटी तोड़ीऔर खा गया |हर बार वह रोटी तोड़ता और जो हिस्सा ज्यादा दीखता उसे खा जाता |धीरे धीरे वह पूरी रोटी खा गया और बिल्लियाँ
देखती ही रह गईं |दौनों की लड़ाई में तीसरे का भला हो गया वे ठगी सी देखती ही रह गईं |देखिये यह कविता शायद अच्छी लगे :-
उसने कहा क्यूं झगड़ रही हो ?मेरे पास आओ मैं हिस्सा कर देता हूँ
बिल्ली ने रोटी बन्दर को दी |उसने रोटी के दो भाग किये |जिसमें रोटी ज्यादा थी उसमें से रोटी तोड़ीऔर खा गया |हर बार वह रोटी तोड़ता और जो हिस्सा ज्यादा दीखता उसे खा जाता |धीरे धीरे वह पूरी रोटी खा गया और बिल्लियाँ
देखती ही रह गईं |दौनों की लड़ाई में तीसरे का भला हो गया वे ठगी सी देखती ही रह गईं |देखिये यह कविता शायद अच्छी लगे :-
धर में चिराग आया
स्वप्नों की बारिश हुई
बढ़ते देर ना लगी
आशा भी बढ़ने लगी
स्कूल गए कॉलेज गए
पर न्याय शिक्षा से ना किया
लक्ष तक पहुँच नहीं पाए
जैसे तैसे धरती को छुआ
मस्तिष्क बहुत विचलित हुआ
पढ़ा लिखा व्यर्थ गया
राजनीति का भूत चढ़ा
गले गले तक पंक में डूबे
गले गले तक पंक में डूबे
पहले जो कभी दोस्त हुआ करते थे
अब आपस में लड़ते झगड़ते
एक दूसरे की काट करते
भीतर घात करते
देश हित भूल कर
केवल अपना घर भरते
आम आदमीं ठगा गया
खुद पर ही लज्जित हुआ
कैसा नेता चुन लिया
देश गर्त में डुबो दिया
आपसी लड़ाई में
देश खोखला किया
धर के चिराग ने ही
आशियाना जला दिया |
आशा