01 दिसंबर, 2009

बाल श्रमिक

तपती धूप , दमकते चहरे ,
श्रमकण जिनपर गए उकेरे ,
काले भूरे बाल सुनहरे ,
भोले भाले नन्हे चेहरे ,
जल्दी जल्दी हाथ चलाते ,
थक जाते पर रुक ना पाते ,
उस पर भी वे झिड़के जाते ,
सजल हुई आँखे , पर हँसते ,
मन के टूटे तार लरजते |

आशा

30 नवंबर, 2009

एक कहानी तुलसी की

एक गाँव में तुलसी नाम की एक महिला रहती थी | वह रोज अपने आँगन में लगी तुलसी पर जल चढ़ाती थी |
जब वह पूजन करती थी तब वह भगवान से प्रार्थना करती थी कि यदि वह मरे तब उसे भगवान विष्णु का
कन्धा मिले |

एक रात वह अचानक चल बसी | आसपास के सभी लोग एकत्र हो कर उसे चक्रतीर्थ ले जाने की तैयारी
करने लगे | जब उसकी अर्थी तैयार की जा रही थी लागों ने पाया कि उसे उठाना असम्भव है | वह पत्थर
कि तरह भारी हो गई थी |
उधर विष्णु लोक में जोर जोर से घंटे बजने लगे | उस समय विष्णु जी शेष शैया पर विश्राम कर रहे थे |
लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रहीं थीं | घंटों की आवाज से विष्णु जी विचलित हो उठे | लक्ष्मी जी ने परेशानी का
कारण जानना चाहा | भगवान ने कहा मुझे मेरा कोई भक्त बुला रहा है |मुझे अभी वहाँ जाना होगा |
हरी ने एक बालक का रूप धरा व वहाँ जा पहुँचे | वहाँ जा कर उसे अपना कन्धा दिया |जैसे ही भगबान
का स्पर्श हुआ अर्थी एकदम हल्की हो गयी और महिला की मुक्ति हो गई |

















25 नवंबर, 2009

मनोभाव


मनोभाव पिघल कर आ जाते
खुली किताब से चेहरे पे
अनचाही बातों का भी,
इजहार कराते चेहरे से |
ये राज कभी न समझ पाए
अपने बेगाने कहने से
अहसास तभी तक बाकी है
जो भाव समझ ले चेहरे से|
रहते जो दूर बसेरे से
सहते दूरी को गहरे से
मनोभाव सिमट कर रह जाते
अंतर्मन में धीरे से .........|


आशा

23 नवंबर, 2009

सुनामी

पहले मुझे समुन्दर बहुत भाता था ,
बार बार अपनी ओर खींच ले जाता था ,
देख लहरों का विकराल रूप
मैं भूल गई वह छटा अनूप ,
जो कभी खींच ले जाती थी ,
समुन्दरी लहर मुझे बहुत सुहाती थी |
पर एक दिन सुनामी का कहर ,
ले गया कितनों का सुख छीन कर ,
और भर गया मन में अजीब सा डर ,
अब नहीं मचलता मन उसे देख कर |

आशा

21 नवंबर, 2009

दूरियाँ


दूरियाँ बढ़ जाएँ यदि
मुश्किल पार जाना है
दूरियाँ घट जाने का
अंजाम अजाना है ।
जिसने समझा, सहा, देखा
पर पा न सका थाह दूरी की
पहेली थी जो दूरी की
रही फिर भी अधूरी ही ।
क्या है गणित दूरी का
ना समझो तो अच्छा है
निभ जाये जो जैसा है
वही रिश्ता ही सच्चा है ।

आशा

16 नवंबर, 2009

अवनि


हरा लिबास और सुंदर मुखड़ा
जैसे हो धरती का टुकड़ा
नीली नीली प्यारी आँखें
झील सी गहराई उनमें
मैं देखता ऐसा लगता
जैसे झील किसी से करती बातें
हँसी तेरी है झरने जैसी
चाल तेरी है नदिया जैसी
मंद हवा सा हिलता आँचल
अवनि सा दिल तुझे दे गया
मुझको अपने साथ ले गया !

आशा

15 नवंबर, 2009

दीपक


देश कहीं यदि घर बन जाये
और हमें मिले दीपक का जीवन
तब तम को हम दूर भगायें
दीपक से नश्वर हो जायें
पुनः देश को घर सा सजायें
दीवाली हर रोज मनायें ।

आशा