23 सितंबर, 2010

है जन्म दिन छोटे का

कल है जन्म दिन छोटे का ,
बार बार प्रश्न करता है ,
मां तुम केक कब लाओगी ,
मेरे लिए क्या बनाओगी ,
इस बार जींस लाना ,
नया शर्ट भी दिलवाना ,
अभी वह नहीं जानता ,
महंगाई क्या होती है ,
गरीबी किसे कहते हैं ,
घर की हालत ऐसी क्यूँ है?
उसके प्रश्न सुन कर ,
दिल छलनी होने लगता है ,
रोने को मन करता है ,
वह सोचने लगती है ,
कैसे उसे संतुष्ट करे ,
उसकी सालगिरह कैसे मनाए ,
सड़क पूरी सूनी है,
काफी रात बाकी है ,
भारी कदम लिए खड़ी थी ,
सोच रही थी कल क्या होगा ,
एक कार पीछे से आई ,
ड्राइवर ने होर्न बजाया ,
बेध्यानी में सुन ना पाई ,
गति थी गाड़ी की धीमी ,
चोट तो लगी पर मृत्यु ना आई ,
कार वाला डर गया था ,
पांचसौ का नोट निकाला ,
उस पर फेंका और चल दिया ,
जैसे तैसे घर को आई ,
अपनी चोटों को सहलाया ,
पर वह यह सोच खुश थी ,
कल सालगिरह तो मन पाएगी ,
प्रश्नों की झड़ी से तो बच पाएगी ,
चोटों का क्या वे तो,
ठीक हो ही जाएंगी|
आशा

22 सितंबर, 2010

मैं गुनगुनाता हूं

मैं गुनगुनाता हूं ,
गीत गाता हूं ,
कभी अपनों के लिए ,
कभी गैरों के लिए ,
जब किसी दिल को छू जाता है ,
एक आह निकलती है ,
सर्द सर्द होंठों से ,
यूँ सुनाई नहीं देती ,
पर खो जाती है नीलाम्बर में ,
घुल मिल जाती है उस में ,
लेखन और गायन मेरी आदत नहीं है ,
है एक गुबार मेरे दिल का ,
ह्रदय के किसी कौने से निकली आवाज ,
कई बार मुझे बहकाती है ,
शब्द खुद ही प्रस्फुटित होते हैं ,
गीतों की माला बनती जाती है ,
आवाज का सानिद्ध्य पा ,
गीत जीवंत हो जाते हैं ,
जाने कितनों के मन छू जाते हैं ,
ना सुर ना ताल ,
फिर भी वह दर्द जो छुपा था ,
बरसों से दिल में ,
कई बार उभर कर आता है ,
ले शब्दों का रूप मुझे छलता है ,
मैं नहीं जानता,
है यह सब क्या ,
ना ही गीतकार बनने की ,
तमन्ना रखता हूं ,
पर मेरे अपने ,
संग्रहित उन्हें कर लेते हैं ,
कई बार पिछले गीतों की ,
याद दिलाते हैं ,
उन्हें सुनना चाहते हैं ,
दर्द ह्रदय का,
और उभर कर आता है ,
कई रचनाओं का,
कलेवर बन जाता है ,
मैं कोई धरोहर गीतों की ,
छोड़ना नहीं चाहता ,
पर आवाज कहीं,
दिल के भीतर से आती है ,
उसे ही शब्दों में पिरोता हूं ,
वही मेरा गीत है ,
वही मेरी प्रेरणा है |
आशा

21 सितंबर, 2010

सम्मोहन

यह प्यार है अनजानों का ,
है अहसास चंद लम्हों का ,
कैसा अजीब सा आकर्षण ,
या है कोई सम्मोहन ,
मैने जब से उसे देखा है ,
मेरे उसके बीच रिश्ता क्या है ,
मैं नहीं जानता ,
पर जब भी देखता हूं उसे ,
कभी दूर से तो कभी पास से ,
सोचता हूं देख उसे ,
देखता ही रहूँ किसी तस्वीर की तरह ,
भूले से भी कोई छू न ले ,
कहीं मैली ना हो जाए ,
चाहता हूं यह सिलसिला,
अनवरत चलता रहे ,
है वह भी शायद मुझ जैसी ,
लटें मुंह पर बिखेरे ,
जब पास से गुजरती है ,
हल्का सा झटका दे उन्हें ,
स्मित हास्य से ,नयनों से ,
मुझे अंदर तक छू जाती है ,
पर एक शब्द भी नहीं कहती ,
मन में छिपी भावना को ,
ओंठों तक आने नहीं देती ,
आज तक कभी ,
आमना सामना न हुआ ,
शब्दों का आदान प्रदान न हुआ ,
पर बहुत गहराई तक ,
उतर गई है वह ,
मेरे मन के अंदर ,
हर ओर छा गई है ,
सावन की घटा बन कर ,
लगता है हम दौनों में ,
कोई अटूट रिश्ता है ,
और न जाने कब तक रहेगा ,
यदि है यह प्रेम का बंधन ,
मुझे भय है ,
यह स्थाई न होगा ,
इस पुष्प की सुगंध को ,
कहीं समय की आंधी ,
उड़ा न ले जाए ,
यह अधूरा ही न रह जाए ,
फिर वह ना जाने कहाँ होगी ,
मैं भी कहीं खो जाउंगा ,
तब आँखों की यह भाषा ,
दर्द का यह रिश्ता ,
बहुत दूर की बात होगी ,
हमारे अनजाने प्रेम की कहानी ,
न जाने कहाँ खो जाएगी ,
मैं इसे किस्मत कहूं या कुछ और ,
जहां भी गया ,
खाली हाथ ही आया हूं ,
इस वीराने में |
आशा

20 सितंबर, 2010

प्रतीक्षा

ऊन और सलाई ले हाथों में ,
बैठी थी कुनकुनी धुप में ,
जाने किस उधेड़बुन में ,
ना जाने क्या सोच रही थी ,
जैसे ही कुछ बुनती थी ,
सोच सोच मुस्काती थी ,
आने वाले की तैयारी में ,
कुछ अधिक व्यस्त हो जाती थी ,
कभी बेटी या बेटा चुनती थी ,
या प्यारा सा नाम सोचती थी ,
फिर भी चिंता,
साथ न छोड़ पाती थी ,
कारण जब भी जानना चाहा ,
शर्मा कर लाल हो जाती थी ,
पर चेहरे पर चिंता की लकीरें ,
यह साफ बयानी करती थीं ,
मन में छिपी बेचैनी ,
चेहरे पर आती जाती थी ,
प्रसव पूर्व भय मन का ,
उजागर करती थी ,
शायद यही कारण होगा ,
वह सहज नहीं हो पाती थी ,
हाथों में सलाई की गति,
और तेज हो जाती थी ,
जब एक फंदा उतरता था ,
कई प्रश्नों से घिरा ,
स्वयं को पाती थी ,
डरती थी यदि बच ना पाई
तब आने वाले का क्या होगा ,
और यदि वह ना आ पाया ,
इस तैयारी का क्या होगा ,
मन करता था पास बैठूं ,
प्यार से उसे समझाऊं ,
जब तक चिंता मुक्त ना होगी ,
स्वस्थ शिशु कैसे पाएगी ,
अपना सारा प्यार,
किस पर लुटाएगी |

आशा

19 सितंबर, 2010

हर श्वास कुछ कहती है

साँसें लेते हैं अनगिनत,
जन्म से मृत्यु तक ,
उनको गिनना है कठिन ,
पर हर श्वास कुछ कहती है ,
ध्यान नहीं जाता ,
बच्चा मुस्कराता है ,
ठुमक ठुमक कर चलता है ,
दौडता है भागता है ,
तेज तेज सांसें लेता है ,
माँ बहुत खुश होती है ,
वह गहरी सांस ले रहा है .
जल्दी बड़ा हो रहा है ,
सर्दी हो या बेचैनी हो ,
माँ चिन्तितं हो जाती है ,
नन्हे की सुरक्षा के लिए |
मृगनयनी अभिसारिका ,
यौवन से परिपूर्ण प्रेयसी ,
जब सन्मुख होती है ,
साँसे चौगुनी हो जाती है ,
मन को स्पंदित कर जाती हैं ,
जैसे ही वह मुड़ती है ,
मन आकुल हो जाता है .
गति साँसों की
धीमी हो जाती है |
यदि क्रोध पर संयम ना हो ,
और मन का आपा खो जाए ,
तब श्वास तीव्र हो जाती है ,
गर्म श्वास क्षति पहुचाती है |
कभी समस्या भी हो जाती है
वृद्धावस्था में क्षय होती साँसें ,
बार बार चेताती हैं ,
यदि ध्यान न दिया गया ,
क्षतिपूर्ति संभव नहीं होती ,
अंतिम श्वास आते ही ,
दीपक की लौ भभकती है ,
फिर अपार शान्ति छा जाती है ,
मृतु पाश मैं बंध कर,
चली जाती है जिंदगी जाने कहाँ,
और थम जाता है,
साँसों का सफर ,
और श्वास मौन हो जाती है |
आशा

18 सितंबर, 2010

था विश्वास मुझे तुम पर

इस अजनवी शहर में ,
जब रखे थे कदम ,
मुझे कुछ नया नहीं लगा था ,
जानते हो क्यूँ ,
तब तुम मेरे साथ थे ,
था अटूट बंधन विश्वास का ,
सब कुछ पीछे छोड़ आई थी ,
साथ जीने मरने की,
कसमें भी खाई थीं ,
पर थी मैं गलत ,
तुम्हें समझ नहीं पाई ,
केवल सतही व्यवहार को ही,
सब कुछ जान बैठी ,
तुम इतना बदल जाओगे ,
आते ही भटक जाओगे ,
मुझ से दूर होते जाओगे
कभी सोचा न था ,
तुम पर आस्था कर बैठी ,
अपना सर्वस्व लुटा बैठी ,
हूं बर्बादी के कगार पर,
ना धन ना कोई वैभव ,
बहुत हैरान हूं ,
परेशान हूं ,
शर्मिंदगी अपने लिए ,
मन में समेटे बैठी हूं ,
अब तुम गैर लगते हो ,
पास होते हुए भी,
अपने नहीं लगते ,
शहर अजनवी लगता है ,
हूं मैं एक रिक्त पड़ा मकान ,
जिस पर अनाधिकार ,
कब्जा जमाए बैठे हो |
आशा

17 सितंबर, 2010

एक कवि ऐसा भी

जब भी कुछ लिखता है ,
उसे सुनाना चाहता है ,
कुछ प्रोत्साहन चाहता है ,
पर कोई श्रोता नहीं मिलता ,
जब तक सुना नहीं लेता ,
उसे चैन नहीं आता ,
कोई भूल से फँस जाए ,
कविता सुनना भी ना चाहे ,
बार बार उसे रोक कर,
कई बहाने खोज खोज कर ,
कविता उसे सुनाता है ,
तभी चैन पाता है ,
भूले से यदि मंच पर ,
ध्वनिविस्तारक हाथ में आजाए ,
चाहे श्रोताओं का शोर हो ,
या तालियों कि गड़गड़ाहट,
कुछ अधिक जोश में आ जाता है ,
कविता पर कविता सुनाता है ,
अपने लेखन पर मुग्ध होता ,
कविसम्मेलन कि समाप्ति पर ,
पंडाल खाली देख सोचता,
अभी भीड़ आएगी उसे बधाई देने ,
पर ऐसा कुछ नहीं होता ,
केवल एक पहलवान वहां है ,
उससे प्रश्न करता है ,
कैसा लगा कविसम्मेलन ,
और मेरा कविता पाठ ,
वह तो जैसा था सो था ,
मैं उसे ढूँढ रहा हं ,
जिसने तुम्हें बुलाया था ,
वह आज भी आशान्वित है ,
कहीं से तो बुलावा आएगा ,
कोई उसे सराहेगा |
आशा